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Tuesday, 13 March 2018

हीरा कारोबारी दीपेश शाह के 12 वर्षीय बेटा भव्य की 19 अप्रैल को दीक्षा

सूरत.हीरा कारोबारी दीपेश शाह का 12 वर्षीय बेटा भव्य 19 अप्रैल से जैन मुनि बन जाएगा। इम्पोर्टेड कारों से लेकर बाइक, परफ्यूम, गोगल्स के शौकीन भव्य ने संयम और त्याग की राह पर चलने का प्रण लिया है। पिछले साल 16 अक्टूबर को उसकी मुहूर्त यात्रा भी फरारी कार से निकाली गई थी। दीक्षा उमरा स्थित जैन संघ में सुबह 8 बजे आचार्य रश्मिरत्नसूरी देंगे  

भव्य का परिवार सरगम शॉपिंग सेंटर स्थित सागर अपार्टमेंट में रहता है।  छठी कक्षा में 79 प्रतिशत अंक लाने वाला भव्य छुट्टियों में मुनियों संग विहार करने लगा और फिर पढ़ाई छोड़ दी।
 अब तक बड़ोदा, अहमदाबाद, राजकोट, राजस्थान में 1000 किमी से अधिक विहार कर चुका है। शाम होने से पहले ही भोजन और त्याग की बदौलत उसे दीक्षा की अनुमति मिली।

बहन ने ली थी 12 की उम्र में दीक्षा- मां पिकाबेन शाह ने बताया कि बड़ा बेटा इंद्र पढ़ रहा है। बेटी प्रियांशी ने 4 वर्ष पहले 12 साल की उम्र में दीक्षा ली थी। बहन की दीक्षा और घर का माहौल देखकर ही भव्य के मन में वैराग्य जगा।  हमने भव्य को 2 साल रुकने को कहा, पर उसकी जिद दीदी की उम्र में दीक्षा लेने की है।

Monday, 11 December 2017

प्रभु की उपासना के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य : ज्ञानरश्मि विजय जी

सूरत - रांदेरस्थित ओलंपिया टावर में श्रावकों को संबोधित करते हुए ज्ञानरश्मि विजय जी ने कहा कि प्रभु की आज्ञा का परिपूर्ण पालन आैर उपासना के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य है। मन, वचन आैर काया के त्रिकरण योग ने जिनेश्वर भगवंतों के तारक उपदेश का श्रद्धाभाव से श्रवण करना चाहिए। ज्ञानरश्मि जी ने कहा कि प्रभु की शरण में जाने के लिए सबसे श्रेष्ठ माध्यम ही उनकी आज्ञा का अटूट पालन किया जाए। तीर्थंकर परमात्मा की आज्ञा का शुद्ध पालन जीवन कल्याण का मार्ग सरल करता है। तीर्थंकरों के विषय में ज्ञानरश्मि जी ने कहा कि भवोभव के जो मार्ग है उस पर वह चल चुके हैं, वह खुद भी उन रास्तों से बाहर आए हैं आैर जो उनके चरण में गया, जिन्होंने उनकी शरण हासिल की, उनको भी उन्होंने मुक्ति दी। प्रभु की भावोद्धारक आज्ञा आैर उनकी वाणी के प्रति श्रद्धा रखनेवाला मोक्ष पाता है प्रभु की शरण में जानेवाले का भव-भ्रमण रुक जाता है। अरिहंत भगवंत भले ही वर्तमान में हमारे बीच सदेह मौजूद हों पर उनकी अनुपस्थिति मूर्ति के स्वरूप आैर आज्ञा के रूप में सभी स्थानों पर मौजूद रहते हैं। हीरा-मोती से भी मूल्यवान अगर कोई चीज है तो वह है सुदेव गुरु धर्म के प्रति हमारी आस्था। यह अटूट आस्था ही हमारे लिए मुक्ति का माध्यम है। 

योगी बनाने की शक्ति प्रभु पार्श्वनाथ में है : पद्मदर्शन विजय 
बलेश्वर स्थित श्री लब्धि विक्रम राज्यसूरी जैन तीर्थधाम में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के पोष दशमी के अवसर पर 250 से अधिक तपस्वी पद्मदर्शन विजय जी के साथ जुड़े। इस अवसर पर पद्मदर्शन जी ने कहा कि भोगी को योगी बनाने की शक्ति पार्श्वनाथ प्रभु की है। मुसीबतों को दूर करने का अगर आज के समय में किसी में सामर्थ्य है तो वह केवल पार्श्व प्रभु में हैं। आज अधिकतर लोग समस्या ग्रस्त हैं। कर्मों से अधिक भयानक कुसंस्कार है। कुसंस्कार के हमले में अच्छे-अच्छे योगी भी भ्रष्ट हो जाते हैं। इस संसार यात्रा में मूल संस्कार यात्रा है। हमें इस जन्म में कुसंस्कारों के उन्मूलन के लिए साधना करनी है। अगर हम इन कुसंस्कारों को खत्म नहीं करेंगे तो कुछ लोग भ्रमित कर देंगे। पद्मदर्शन जी ने कहा कि फिलहाल तो कदम-कदम पर कमजोर अवसर आपको भ्रमित करने, पथभ्रष्ट करने के लिए तैयार बैठे हैं। टीवी, इंटरनेट, वॉट्सएप आैर फेसबुक ने इंसानी जिंदगी को तबाह करके रख दिया है। भोगवाद ने सूरमाओं को भी अपनी चपेट में ले रखा है। जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है, उसका उपयोग करना सीखें। उन्होंने सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं काे संस्कारों को अपने जीवन में उतारने का उपदेश दिया। 
भाव धर्म जिन शासन का महत्वपूर्ण भेंट है : ज्ञानरश्मि विजय जी
शहर के रांदेर स्थित ओलंपिया टावर में श्रावकों को संबोधित करते हुए ज्ञानरश्मि विजय जी ने कहा कि विश्व वत्सल जिनशासन की दुनिया को सबसे महत्वपूर्ण भेंट है 'भाव धर्म'। भाव धर्म यानी श्रद्धा आैर विश्वास। बिना श्रद्धा के कोई भी धार्मिक क्रिया लाभदायक नहीं होती है। हम जीवन में जिस तरह कई मामलों में वकील, डॉक्टर, पुलिस आैर ड्राइवर आदि पर अपने कार्यों के लिए विश्वास रखते हैं, इसी तरह हमें जिनशासन की उन्नत तप-जप आराधना में श्रद्धा रखा इतना ही जरूरी है। बिना श्रद्धा रखे हम अपनी कोई धार्मिक क्रिया नहीं कर सकते। 

Wednesday, 29 November 2017

ऐतिहासिक गुजरात राज्य में गुरु मूर्ति हिमाचल सूरीश्वर जी की प्रथम प्रतिष्ठा सूरत में सम्पन

ऐतिहासिक गुजरात राज्य में गुरु मूर्ति हिमाचल सूरीश्वर जी की प्रथम प्रतिष्ठा सूरत में सम्पन

सुरत (चम्पालाल छाजेड़) श्रीशीतलनाथ जैन श्री संघ के घर आंगने आज मंगलवार को सभी को शीतलता प्रदान करने वाले अरिहंत परमात्मा श्री शीतलनाथ दादा की छत्र छाया में श्री नाकोड़ा तीर्थोद्वारक,मेवाड़ केशरी, परम पूज्य तपागछीय आचार्य श्रीमद विजय हिमाचल सूरीश्वर जी म.सा.की भव्य गुरुमूर्ति की प्रतिष्ठा सम्पन हुई। हिमाचल सूरीश्वर जी की यह गुरु मूर्ति गुजरात राज्य की प्रथम स्थापित मूर्ति है। गुजरात मे अभी तक किसी भी जैन मंदिर में हिमाचल सुरीश्वर जी की मूर्ति प्रतिष्ठित नही हुई है सूरत में दर्शन रेजीडेंसी में आज प्रतिषिठत हुई गुरु मूर्ति गुजरात एव सूरत की प्रथम गुरु मूर्ति है। गुरुदेव का भव्य प्रवेश  १०८ फुट ऊंची दादा आदिनाथ मूर्ति प्रेरक,शासन प्रभावक,पूज्यपाद आचार्य श्री अशोकसागर सूरीश्वर जी म.सा.आदि ठाना एव परम पूज्य तपागछिय आचार्य श्री हिमाचल सूरीश्वरजी संमुदायवर्तिनी गुरूवर्या पूज्य उद्योत श्री जी म.सा.की शिष्या पूज्य सुरेखा श्री जी म सा आदि ठाना का आज शंखेश्वर कॉम्प्लेक्स से गाजते बाजते बेंड की मधुर ध्वनि के साथ महिलाओ के सोमैया के साथ हुवा,सर्व प्रथम बेंड, गुरु भगवंत,पुरूष वर्ग, गुरु प्रतिमा का रथ,साध्वी समुदाय, श्राविका वरघोड़े की भव्य शोभा थे। इससे पूर्व विधि विधान पूर्व प्रातः ७:३० बजे प्रभावशाली अढारह अभिषेक संगीतकार सोहन भाई सुरीली आवाज में प्रभु की भक्ति के साथ हुवा,प्रातः ९:३० मंगल प्रवचन एव गुरु मूर्ति प्रतिष्ठा सम्बन्धी चढ़ावे बोले गए।। तपागछिय आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि गुरुओ के बताये मार्ग पर चलना ही मानव धर्म का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए  उन्होंने आगे बताया कि गुरु ही गोविंद (अरिहंत परमात्मा) से परिचय कराने का कार्य करते है।उन्होंने संघ के लिए गर्व महसूस करते हुवे कहा कि श्री शीतलनाथ जैन श्री बहुत ही भाग्यशाली है जिनके यहा गुजरात राज्य की प्रथम गुरु मूर्ति हिमाचल सूरीश्वर जी की प्रतिष्ठा हो रही है। पूज्य आचार्य श्री एव साध्वी जी को लाभार्थी परिवार की तरफ से काम्बली ओढ़ाई गई।।पुण्यहाम पुण्यहाम प्रीयनतांम प्रियन्ताम के उद्घोष के साथ शुभ मुर्हत में दोपहर ११:३९ पर शुभ मंगल वेला में आचार्य श्री अशोकसागर सूरीश्वर जी म सा को पावन निश्रा एव हस्ते भव्य ऐतिहासिक गुजरात की प्रथम प्रतिष्ठा सम्पन हुई।। उसके बाद दोपहर १२ बजे संघ स्वामीवत्सल्य सम्पन हुआ। कार्यक्रम का संचालन शान्तिलाल राठौड़ ने किया।


Friday, 24 November 2017

घर नहीं मन बड़ा हो तभी परिवार बन सकता है : आचार्य राजरक्षित विजय

सूरत | अठवालाइंस जैन संघ में आचार्य हंसकीर्ति सूरी महाराज के सानिध्य में गुरुवार के प्रवचन माला का आयोजन हुआ। उन्होंने बताया कि अगरबत्ती जलकर भी सुगंध फैलाती है, पेड़ पत्थर मारने पर आम देता है। इससे ही प्रेरणा लेकर मनुष्य को भी अपने निंदा करने वाले को प्रेम देना चाहिए। परिवार बनाना हो तो मन बड़ा रखना चाहिए। घर बड़ा होने से परिवार नहीं बन सकता। मनुष्य भले ही आग को भयानक कहते हैं परंतु आग भी पानी के आगे हार जाता है। इसी प्रकार क्रोध में भले कितनी ताकत हो परंतु प्रेम पानी की तरह उसे हरा देता है। आज के युग में पिता के पास बेटे के लिए समय नहीं है, भाई के पास बहन के लिए समय नहीं इसीलिए सभी का जीवन तनाव ग्रस्त है। 

14 मुमुक्षुओं ने संसार त्याग संयम पथ का संकल्प लिया वेष, केश और नाम परिवर्तन कर नए जीवन की शुरुआत

सूरत - श्रीउमरा जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के बलर फार्म में निर्मित सूरी प्रेम-भुवनभानु जितेंद्र प्रव्रज्या नगरी में दांता निवासी गजीबेन अंबालाल तलकचंद परिवार द्वारा आयोजित प्रव्रज्या पर्व के आखिरी दिन दीक्षा दानेश्वरी आचार्य गुणरत्नसूरी, वैराग्य वारिधि आचार्य कुलचंद्र सूरीश्वर, 8 आचार्य भगवंतो, 300 से अधिक साधु-साध्वी भगवंतों के सानिध्य में और 10 हजार से अधिक भाई-बहनों की मौजूदगी में 14 मुमुक्षुओं ने संसार का त्याग कर भगवान महावीर के संयम वेश को धारण किया। इस अवसर पर चारों ओर से संयम धर्म की जय-जयकार के नारे गूंजने लगे। इसके साथ दीक्षा दानेश्वरी के दीक्षा का आंकड़ा 384 तक पहुंच चुका है। इस अवसर पर मंडप में विराजित आचार्य भगवंतों में आचार्य पुण्यरत्नसूरी, आचार्य यशोरत्नसूरी, आचार्य रविरत्न सूरी, मार्ग दर्शक आचार्य रश्मिरत्नसूरी, आचार्य हंसकीर्ति सूरी, आचार्य रश्मिराज सूरी, 120 भगवंतों, प्रवर्तिनी साध्वी पुण्यरेखा एवं 200 से अधिक साध्वी भगवंत उपस्थित थे। 
सुबह प्रव्रज्या नगरी में 14 मुमुक्षुओं, गुरु भगवंतों आैर परमात्मा पर अक्षत वर्षा कर प्रवेश हुआ। इसके बाद मुमुक्षुओं को तीन प्रदक्षिणा देकर दीक्षा की मंगल विधि का प्रारंभ हुआ। मंगल मुहूर्त करीब आने पर सभी मुमुक्षुओं ने यह प्रार्थना की, मेरा मुंडन करिए, हे गुरुदेव मुझे प्रव्रज्या दीजिए, हे गुरुदेव मुझे प्रभु वीर का धवल उज्ज्वल वेष दीजिए। यह तीन आदेश मांगने के बाद आचार्य गुणरत्न सूरी जी ने हित शिक्षा दी, जिस तरह से पिंजरे में बंद पंखी मुक्ति के लिए रोजाना पिंजरे को तोड़ने की कोशिश करता है, पिंजरा टूटने के बाद वह अनंत आकाश में उड़ने लगता है। इसी तरह मुमुक्षुओं ने संसार के सभी बंधन आैर मोह का त्याग कर संयम के मुक्त आकाश में उड़ने के लिए बेताब हैं। संसार के सुख को छोड़कर कठोर साधना के मार्ग पर चलने को तैयार है। अनंता देव-गुरु आैर सकल संघ के आशीर्वाद उनके साथ हैं।
मंडप में प्रवेश करते ही गूंजने लगा नूतन दीक्षित जय का नाद8बजे प्रत्येक मुमुक्षु को गुरुदेव ने रजोहरण प्रदान की। इस अवसर पर वेष परिवर्तित कर सभी 14 मुमुक्षुओं ने भगवान महावीर के संयम धर्म का वेश धारण कर अपनी नजरें नीची रखते हुए मंडप में प्रवेश किया तब 'नूतन दीक्षित का जय-जयकार' का नाद चारों तरफ गूंज उठा। केश लुंचन आैर नामकरण का विधान हुआ। इससे पूर्व नंदी सूत्र का मंगलपाठ सुनाया गया। सभी मुमुक्षुओं को कुंकू चावल से विजय तिलक किया गया। 

Friday, 17 November 2017

पाल जैन संघ में 158 आराधकों ने 47 दिन तक साधु जीवन व्यतीत किया, इन सभी को मोक्षमाला पहनाई गई

दस हजार से अधिक श्रावकों ने इस समारोह में आचार्य गुणरत्नसूरी महाराज के सानिध्य में अनुमोदन किया

सूरत - पालजैन संघ में 158 तपस्वियों को रजत द्रव्य अर्पित कर के मोक्ष माला पहनाया गया। इस समारोह में 10 हजार से अधिक श्रावकों ने आचार्य गुणरत्नसूरी महाराज के सानिध्य में अनुमोदन किया। आचार्य गुणरत्नसूरी के सानिध्य में 47 दिनों के उपधान तप के आराधना के बाद शुक्रवार को पारणा किया गया। इस अवसर पर 158 श्रावकों को रजत द्रव्य अर्पित कर के मोक्ष माला पहनाया गया। 300 आराधकों ने उपधान तप आराधना की थी। इनमें से 158 आराधकों ने 47 दिन तक साधू जीवन व्यतीत किया। इस सभी का गुरुवार को अडाजण के विभिन्न क्षेत्रों से शोभायात्रा निकाली गई और मोक्ष माला अर्पित किया गया। आचार्य गुणरत्नसूरी महाराज ने बताया कि उपधान तप की आराधना से साधक शुद्ध होता है। मोक्ष माला मुक्ति रूपी कन्या की वरमाला है। साक्षात गुणों की माला है। आचार्य रश्मिरत्नसूरी महाराज ने बताया कि माला का नाम ही मोक्ष माला है। यही बताती है कि साधना का उद्देश्य क्या है। जरी की बनावट वाली 108 मोती की मोक्ष माला अर्पित करने के बाद गुणरत्नसूरी, पुण्यरत्नसूरी, यशोरत्नसूरी, रविरत्न सूरी और हंसकीर्ति सूरी ने सभी तपस्वियों को आशीर्वाद दिया। 

 

Monday, 13 November 2017

मुमुक्षु नवीनभाई का वरघोड़ा निकला 23 नवंबर को होगी सामूहिक दीक्षा

सूरत - संयमके मार्ग पर जाना भव्यता के अनुमोदन का भी एक पुण्य ही है। जिस मार्ग पर महावीर चले उस पर चलना किसी बिरले का ही काम है। इस भव्यता के अनुमोदन के लिए उमड़े श्रावक भी इस पुण्य के भागीदार बने हैं। इसीलिए कहा जाता है कि संयम शूरों का मार्ग है। ये शब्द आचार्य गुणरत्नसूरी महाराज ने बाबू निवास में कहा। सोमवार को नानपुरा सिद्धराज अपार्टमेंट से मुमुक्षु नवीनभाई का वरघोड़ा निकला। इस अवसर पर मार्ग पर बड़ी संख्या में श्रावक उमड़ पड़े और पुष्प की वर्षा की। सिद्धराज अपार्टमेंट से निकला वरसीदान वरघोड़ा बाबू निवास पहुंचने के बाद आचार्य रश्मिसूरी महाराज ने कहा कि संयम के मार्ग जाने वाले नवीनभाई की दीक्षा 23 नवंबर की सामूहिक दीक्षा में की जाएगी। इस अवसर पर बाबू निवास की गली में उमड़े श्रावकों ने मुमुक्षु का अनुमोदन किया। मंगलवार को मुमुक्षु दीपकभाई, हर्षाबेन और हर्षकुमार की दीक्षा का अनुमोदन अडाजण के कार्यक्रम में होगा। योगी कॉॅम्प्लेक्स में आयोजित कार्यक्रम के बाद बुधवार को उनका वरसीदान वरघोड़ा निकलेगा। संयम के मार्ग पर निकलने वाले ये विरले श्रावकों को प्रेरणा प्रदान करते हैं। जीवन के कयासों को काटकर परमात्मा की प्राप्ति ही भगवान महावीर का संदेश है।
अठवा लाइंस जैन संघ में प्रभु महावीर के हुए कार्यक्रम 
प्रभुमहावीर ने जगत को शांति और स्थिरता का संदेश दिया है। दीक्षा लेकर इन्होंने साढ़े बारह वर्ष तक दुखों का सहन किया। यह सब उन्होंने किसी कौम के लिए नहीं अखिल संसार के लिए किया है। वे विश्व को संदेश देकर गए हैं। वे जाति के प्रति कठोर और जगत के प्रति कोमल थे। ये शब्द पंन्यास राजरक्षित विजयजी ने अठवा लाइंस जैन संघ में कहा। अठवा लाइंस जैन संघ में आचार्य हंसकीर्ति विजयजी महाराज की निश्रा में भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणकों मनाया गया। इस अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। पंन्यास राजरक्षित विजय ने कहा कि काम, क्रोध और अहंकार पर विजय पाना कठिन है। प्रभु महावीर कहते है कि दुश्मन पर विजय प्राप्त करे वह वीर कहा जाता है। परंतु अपने दोषों पर जो विजय प्राप्त करे वह महावीर कहा जाता है। काम और क्रोध रूपी दोष भवोभव दुर्गति देते हैं। आज लोग जातिपाति के रोग से ग्रसित हैं, उसकी दवा करते हैं। लेकिन अपने आंतरिक दोषों का दवा नहीं करते। आंतरिक दोषों को दूर करने की श्रेष्ठ दवा धर्म है। 
त्याग के बिना साधना संभव नहीं : पद्मदर्शनजी 
कैलाशनगरजैन संघ में पूज्य पंन्यास प्रवर श्री पद्मदर्शनजी महाराज ने प्रभु महावीर देव के कल्याणक अवसर पर प्रवचन धारा को बहाते हुए कहा कि श्रेय का दान और आसव का उन्मूलन करने के लिए प्रभु ने साधना का मार्ग स्वीकार किया था। समग्र विश्व जब दुखों और दोषों की आग से जल रहा है तो संयम ही हराभरा बाग है। शुभ और शुभ धर्म की साधना संयम जीवन के द्वारा ही हो सकती है। घर में रहकर संयम जीवन जीना संभव नहीं है। संसार के सभी संबंध दब तक त्यागोगे नहीं तब तक जगत की प्राप्ति नहीं हो सकती। प्रभु के पास राज वैभव और समृद्धि की दरिया बह रही थी। इसके बाद भी प्रभु ने जगत के तमाम जीवों को दुखों से मुक्त करने के लिए साधना का मार्ग स्वीकार किया। कर्म सत्ता के सामने धर्म सत्ता की प्रचंड शक्ति है, इस संदेश को देने के लिए दीक्षा का मार्ग स्वीकार किए थे। धर्म करने वाले के पास सात्विकता होनी चाहिए। उपसर्गों के पहाड़ टूट पड़े तो भी साधक को हिमालय की तरह अटल रहना चाहिए। कर्मों का नाश करने के लिए धर्म तप ही श्रेष्ठ है। जिससे प्रभु ने साढ़े बारह वर्ष की साधना के दौरान साढ़े ग्यारह वर्ष तक निर्जला उपवास करके कर्म को परास्त किया था। सर्व संग का त्याग किए बिना साधना सक्षम नहीं होती। सभी पापों से विराम पाने के लिए संयम का मार्ग है। संसार में आप चाहते हुए भी दर्जनों पाप करने पड़ते हैं। निष्पाप और निर्दोष जीवन जीने के लिए संयम का मार्ग स्वीकार करना चाहिए।संयम मिलने तक आचार शुद्धि और विचार शुद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए। 

महज 1 रुपये में शुद्ध एंव सात्विक भोजन, जैन नवयुवक मंडल सूरत (जैनम) के मॉर्निंग हिरोज का अनूठा प्रयास


सूरत 13 नवम्बर 17- दुनिया मे जहां अमीरी व समृद्धि भरी सौगात से लोग खुश-खुशहाल है तो वहीं दूसरी औऱ भूख, गरीबी, बेरोजगारी आदि पीड़ाओं से करोड़ों-करोड़ों लोग ग्रसित भी हैं, वे दुःख व वेदना के चलते असीमित कष्ट भोग रहे हैं, लेकिन इस दुनिया में परोपकारी वृति के तथा दूसरों के दुःख-दर्द को समझने वाले नेक दिल इंसान तथा संस्थाएं जब तक मौजूद हैं, तब तक उन दुखियारे लोगों के लिए उम्मीद भरी एक किरण बनी हुई हैं, इस बाल दिवस पर सूरत में जैन नवयुवक मंडल (जैनम) द्वारा विकसित नवीनतम उपक्रम "मॉर्निंग हिरोज" के बैनर तले सेवा कार्यों का एक अनूठा प्रयास देखा गया। पिछले 23 वर्षों से मानवीय एंव समाज सेवा में अनवरत रूप से जुटे इस सेवाभावी संगठन के युवाओं ने पीड़ित मानवता के सेवा की एक ऐसी मिसाल प्रस्तुत की है कि उनकी ये योजना भूख व गरीबी से पीड़ित लोगों के दुःख-दर्द को हल्का करने में सहायक बनेगी, यह सर्व विदित हैं कि इंसान की मूलभूत आवश्यकताओं में रोटी कपड़ा व मकान का समावेश हैं, गरीबों, वंचितों के लिए इस महंगाई के दौर में अपने स्वयं का आशियाना खरीदना तो एक सपना तो है ही, तथा साथ ही साथ ये मुश्किल भी नही बल्कि दुर्भर भी हैं, कपड़ा तो फिर भी पैबंद लगा कर या फटा-पुराना पहना जा सकता हैं, लेकिन पेट की आग को शांत करने हेतु रोटी-चटनी की महती आवश्यकता रहती हैं, इसे नही रोका जा सकता, भुखमरी की समस्या के निदान हेतु जो प्रयास जैनम के इन मॉर्निंग हिरोज ने किए हैं अगर हर गांव, हर कस्बे व हर शहर में विभिन्न व्यक्तियों व संगठनों द्वारा हो जाए तो भुखमरी की समस्या का काफी हद तक निराकरण किया जा सकता हैं, "जेनम" के "मॉर्निंग हिरोज" ने आगामी एक वर्ष के लिए प्रति रविवार को सूरत से 15-20 किलोमीटर दूरी के विभिन्न स्लम विस्तारों में 200-200 लोगों को महज 1 रुपये में सात्विक एंव पौष्टिक भोजन पैकेट उपलब्ध कराए जाएंगे, जैनम अध्यक्ष श्री विमल बालड़ के अनुसार एक रुपये की जो नाम मात्र की राशि निर्धारित की गई हैं वो महज एक औपचारिकता भर ही हैं, ताकि किसी को ये महसूस न हो कि वे निःशुल्क रूप से भोजन पैकेट प्राप्त कर रहे हैं, हालांकि बिना एक पैसा दिए भी ये भोजन पैकेट उपलब्ध रहेंगे, जेनम के मंत्री श्री भरत विनायकिया ने बताया कि फ़िलहाल 54 सप्ताहों यानी आगामी एक वर्ष के दौरान प्रत्येक रविवार को अलग-अलग स्लम व झुग्गी-झोपड़ी भरे विस्तारों में जेनम द्वारा संचालित ये फूड वेन पहुंचेगी औऱ महज 1 रुपये में भोजन के पैकेट उपलब्ध कराएगी, हर रविवार को दिए जाने वाले इन भोजन पैकेटों में अलग-अलग किस्म की सामग्री होगी, जिसमें कभी सब्जी-पूड़ी तो कभी इडली व चटनी तो कभी कुछ और और तरह की खाद्य सामग्री होगी, इस महत्व पूर्ण योजना के शुभारम्भ के दिन ये फूड वेंन जिस विस्तार में पहुंची तथा जो भोजन पैकेट बांटे गए उसमें 8 इडली, चटनी,सांभर व केले थे। यह उल्लखनीय हैं कि प्रति सप्ताह 200 भोजन पैकेट लेकर ये वेंन पहुंचेगी उस वेंन को दानदाता पादरू निवासी एंव सूरत प्रवासी श्री सुरेश कुमार जी श्री श्रीमाल परिवार की औऱ से भेंट की गई हैं, विशेष बिंदु यह भी हैं कि जब इस भोजन पैकेट के वितरण की योजना बनी तो उसके लिए कुल 54 सप्ताहों के लिए 54 सहयोगियों ने अपने अर्थ सहयोग के लिए अविलम्ब स्वीकृति दे दी, यह उल्लेखनीय हैं कि इस तरह की योजना का आगाज कुछ वर्षों पूर्व तेलंगाना के हैदराबाद शहर में पादरू जैन नवयुवक मंडल के युवाओं ने की थी, वहां इन युवाओं द्वारा प्रतिदिन महज 1 रु में दाल-चावल व इडली-वड़ा जैसे व्यंजनों के भोजन प्रतिदिन पैकेट वितरित किए जा रहे हैं। इस योजना की चर्चा देश भर में हो रही हैं, जेनम सदस्यों ने अभी इस योजना का आगाज किया हैं, भविष्य में सम्भावनाओं के आधार पर इस योजना का स्वरूप और भी विस्तृत किया जा सकता हैं। जैनम ने इस अवसर पर इसी अल्थान कम्युनिटी हॉल में मुस्कान-2 फन फेयर भी आयोजित किया, जहां अनाथ, मूक बघिर, एच आई वी ग्रस्त तथा फुटपाथ पर जीवन बसर करने वाले गरीब व जरूरतमंद 503 बच्चों को पंक्ति बद्ध बिठा कर सात्विक भोजन करवाया तथा खेलकूद व अन्य मनोरंजक गतिविधियों को अंजाम दिया गया। यह उल्लेखनीय हैं कि इससे पूर्व मुस्कान-1 में सैकड़ों गरीब बच्चों को भोजन परोस कर उन्हें गेम्स आदि खिलाये गए थे, जैनम ने अतीत में मालाणी-सिवांची के जैन युवाओं में खेल-कौशल के विकास हेतु विशाल स्तर पर क्रिकेट प्रतियोगिताएं आयोजित करवाई थी, तथा आगामी दिनों में खेल कुम्भ के आयोजन के माध्यम से किशोरों,युवाओं व युवतियों तथा महिलाओं की खेल प्रतिभा को तलाशा जाएगा। 1 रुपये में भोजन उपलब्ध कराने की योजना के शुभारम्भ अवसर पर जैनम सरंक्षक श्री भंवरलाल गुलेच्छा, समाजसेवी श्री सुरेश पोखरणा, नाकोड़ा सोश्यल ग्रुप के अध्यक्ष श्री रतनचंद गुलेच्छा, मंत्री श्री मूलचन्द विनायकिया, राजस्थान जैन सेवा समिति के अध्यक्ष श्री महेंद्र कांकरिया, मंत्री श्री जितेंद्र छाजेड़, तथा महावीर इंटरनेशनल को औऱ से मेरी स्वयं की उपस्थिति रही। इस अवसर पर उपस्थित 503 गरीब व जरूरतमंद बच्चों के मनोरंजन के उद्देश्य से लॉफ्टर कलाकार कंवरलाल ने अपनी प्रस्तुति दी, मुस्कान-2 के सफल आयोजन में संयोजक नीलेश चौरड़िया, व सह संयोजक अमित रांका की सराहनीय भूमिका रही, इसी तरह मॉर्निंग हिरोज के सफल आयोजन में संयोजक श्री कैलाश श्रीश्रीमाल व सह संयोजक श्री अरविंद जीरावला तथा पूरी टीम का प्रेरक योगदान रहा। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री भरत विनायकिया ने किया। साधुवाद जेनम पदाधिकारी गण व सदस्य गणों तथा मॉर्निंग हिरोज को....
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आलेख-गणपत भंसाली, सूरत (गुजरात)

Tuesday, 31 October 2017

साधु जीवन में लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन से पतन होता है : पद्मदर्शन जी

सूरत- अठवागेट स्थित नानपुरा जैनसंघ में आचार्य पद्मदर्शन जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि निर्लज्ज आत्मा धर्म प्राप्ति के लिए अनुचित है। पाप के विचारों से सर्वथा बचना ही चाहिए। आचार्य ने कहा कि प्रारंभिक चरण में इससे बचना मुश्किल है। पाप के विचारों का आना सहज है लेकिन यह विचार पाप के आचार में लिप्त कर सकते हैंै। पाप के विचार आचार में परिवर्तित न हो इस लिए लज्जा एक चमत्कारिक गुण है। जिसके जीवन में लज्जा हो, खानदानी हो, बुजुर्गों की मर्यादा हो, पाप का भय, धर्म संस्कारों के गुण इस तरह से होते है जो आप को पाप के विचारों से बचाते हैं। समय के साथ वह पाप के विचारों से भी मुक्त कर देते है। 
आचार्य पद्मदर्शन जी ने कहा कि आज किसे किसी भी शर्म के लज्जा नहीं है। साधु जीवन में पाप करना मुश्किल है आैर गृहस्थ जीवन में धर्म का कार्य करना मुश्किल है। साधु जीवन में पाप के निमित्त नहीं है आैर सद निमित्त ढेरों हैं। लेकिन साधु जीवन में जो भी प्रभु द्वारा निर्मित लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन करता है उसका जीवन में अवश्य तौर से पतन होता है। श्रमण जीवन को बचानेवाली चीज केवल प्रभु की आज्ञा है। गृहस्थ जीवन में सद निमित्त मिलना मुश्किल है। पाप के लिए काफी निमित्त है। अगर गृहस्थ संयम, लज्जा के गुण की उपेक्षा करता है, सद गुरु आैर अपने बुजुर्गों की मर्यादा का उल्लंघन करता है तो जीवन भ्रष्ट हो जाता है। आचार्य ने कहा कि अशुभ निमित्त चिकनी मिट्टी की तरह है जिस पर फिसलने के अवसर अधिक है। 

Tuesday, 3 October 2017

मुमुक्षु लोकेश गोलछा का जैन समाज बालाघट ने किया अभिनंदन

बालाघाट। संसार की असारता को जान युवावस्था में ही संयम मार्ग पर चलकर जैन दीक्षा ग्रहण करने वाले जगदलपुर निवासी मुमुक्षु लोकेश गोलछा के बालाघाट आगमन पर उनके वैराग्य तप को नमन करने श्री पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर ट्रस्ट और चातुर्मास समिति द्वारा अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया गया चातुर्मास समिति के अध्यक्ष महेन्द्र सुराना ने बताया कि मुमुक्षु लोकेश गोलछा का जन्म स्व. राणीदान एवं रामूबाई गोलछा के पोते और स्व. सांगीलाल एवं कुसुम गोलछा के सुपुत्र के रूप में 13 नवंबर 1989 में जगदलपुर में हुआ था। बचपन से ही जैन समाज के धार्मिक कार्यक्रमों में रूचि रखने वाले मुमुक्षु लोकेश गोलछा जैसे-जैसे युवा होते गये समाज के धार्मिक कार्यक्रमों और जैन साधुओं के प्रति उनकी रूचि गहरी होती गई और अंततः उन्होंने जैन दीक्षा हासिल कर साधु बनने का निर्णय लिया। जो आगामी 15 नवंबर को आचार्य भगवंत पूज्य श्री जिन पीयूषसागर सूरिश्वर जी म.सा. की पावन निश्रा में आत्मसाधना के पथ पर चलते हुए दीक्षा ग्रहण करेंगे।
उन्होंने बताया कि इससे पूर्व आज 29 सितंबर को । आत्मसाधना के पथ पर चलते हुए जैन साधु बनने दीक्षा ग्रहण करने वाले मुमुक्षु लोकेश गोलछा का बालाघाट आगमन पर स्वागत किया गया। जिनकी तपसाधना पर उनका अभिनंदन करने के लिए प.पू. जिनशिशु प्रज्ञा श्री जी म.सा. की पावन निश्रा में 29 सितंबर को प्रातः 8.30 बजे मुमुक्षु लोकेश गोलछा का वरघोड़ा दादाबाड़ी से पार्श्वनाथ भवन तक निकाला गया। जिसके बाद मुमुक्ष लोकेश गोलछा का सामाजिक अभिनंदन किया गया।