सूरत - संयमके मार्ग पर जाना भव्यता के अनुमोदन का भी एक पुण्य ही है। जिस मार्ग पर महावीर चले उस पर चलना किसी बिरले का ही काम है। इस भव्यता के अनुमोदन के लिए उमड़े श्रावक भी इस पुण्य के भागीदार बने हैं। इसीलिए कहा जाता है कि संयम शूरों का मार्ग है। ये शब्द आचार्य गुणरत्नसूरी महाराज ने बाबू निवास में कहा। सोमवार को नानपुरा सिद्धराज अपार्टमेंट से मुमुक्षु नवीनभाई का वरघोड़ा निकला। इस अवसर पर मार्ग पर बड़ी संख्या में श्रावक उमड़ पड़े और पुष्प की वर्षा की। सिद्धराज अपार्टमेंट से निकला वरसीदान वरघोड़ा बाबू निवास पहुंचने के बाद आचार्य रश्मिसूरी महाराज ने कहा कि संयम के मार्ग जाने वाले नवीनभाई की दीक्षा 23 नवंबर की सामूहिक दीक्षा में की जाएगी। इस अवसर पर बाबू निवास की गली में उमड़े श्रावकों ने मुमुक्षु का अनुमोदन किया। मंगलवार को मुमुक्षु दीपकभाई, हर्षाबेन और हर्षकुमार की दीक्षा का अनुमोदन अडाजण के कार्यक्रम में होगा। योगी कॉॅम्प्लेक्स में आयोजित कार्यक्रम के बाद बुधवार को उनका वरसीदान वरघोड़ा निकलेगा। संयम के मार्ग पर निकलने वाले ये विरले श्रावकों को प्रेरणा प्रदान करते हैं। जीवन के कयासों को काटकर परमात्मा की प्राप्ति ही भगवान महावीर का संदेश है।
अठवा लाइंस जैन संघ में प्रभु महावीर के हुए कार्यक्रम
प्रभुमहावीर ने जगत को शांति और स्थिरता का संदेश दिया है। दीक्षा लेकर इन्होंने साढ़े बारह वर्ष तक दुखों का सहन किया। यह सब उन्होंने किसी कौम के लिए नहीं अखिल संसार के लिए किया है। वे विश्व को संदेश देकर गए हैं। वे जाति के प्रति कठोर और जगत के प्रति कोमल थे। ये शब्द पंन्यास राजरक्षित विजयजी ने अठवा लाइंस जैन संघ में कहा। अठवा लाइंस जैन संघ में आचार्य हंसकीर्ति विजयजी महाराज की निश्रा में भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणकों मनाया गया। इस अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। पंन्यास राजरक्षित विजय ने कहा कि काम, क्रोध और अहंकार पर विजय पाना कठिन है। प्रभु महावीर कहते है कि दुश्मन पर विजय प्राप्त करे वह वीर कहा जाता है। परंतु अपने दोषों पर जो विजय प्राप्त करे वह महावीर कहा जाता है। काम और क्रोध रूपी दोष भवोभव दुर्गति देते हैं। आज लोग जातिपाति के रोग से ग्रसित हैं, उसकी दवा करते हैं। लेकिन अपने आंतरिक दोषों का दवा नहीं करते। आंतरिक दोषों को दूर करने की श्रेष्ठ दवा धर्म है।
त्याग के बिना साधना संभव नहीं : पद्मदर्शनजी
कैलाशनगरजैन संघ में पूज्य पंन्यास प्रवर श्री पद्मदर्शनजी महाराज ने प्रभु महावीर देव के कल्याणक अवसर पर प्रवचन धारा को बहाते हुए कहा कि श्रेय का दान और आसव का उन्मूलन करने के लिए प्रभु ने साधना का मार्ग स्वीकार किया था। समग्र विश्व जब दुखों और दोषों की आग से जल रहा है तो संयम ही हराभरा बाग है। शुभ और शुभ धर्म की साधना संयम जीवन के द्वारा ही हो सकती है। घर में रहकर संयम जीवन जीना संभव नहीं है। संसार के सभी संबंध दब तक त्यागोगे नहीं तब तक जगत की प्राप्ति नहीं हो सकती। प्रभु के पास राज वैभव और समृद्धि की दरिया बह रही थी। इसके बाद भी प्रभु ने जगत के तमाम जीवों को दुखों से मुक्त करने के लिए साधना का मार्ग स्वीकार किया। कर्म सत्ता के सामने धर्म सत्ता की प्रचंड शक्ति है, इस संदेश को देने के लिए दीक्षा का मार्ग स्वीकार किए थे। धर्म करने वाले के पास सात्विकता होनी चाहिए। उपसर्गों के पहाड़ टूट पड़े तो भी साधक को हिमालय की तरह अटल रहना चाहिए। कर्मों का नाश करने के लिए धर्म तप ही श्रेष्ठ है। जिससे प्रभु ने साढ़े बारह वर्ष की साधना के दौरान साढ़े ग्यारह वर्ष तक निर्जला उपवास करके कर्म को परास्त किया था। सर्व संग का त्याग किए बिना साधना सक्षम नहीं होती। सभी पापों से विराम पाने के लिए संयम का मार्ग है। संसार में आप चाहते हुए भी दर्जनों पाप करने पड़ते हैं। निष्पाप और निर्दोष जीवन जीने के लिए संयम का मार्ग स्वीकार करना चाहिए।संयम मिलने तक आचार शुद्धि और विचार शुद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
अठवा लाइंस जैन संघ में प्रभु महावीर के हुए कार्यक्रम
प्रभुमहावीर ने जगत को शांति और स्थिरता का संदेश दिया है। दीक्षा लेकर इन्होंने साढ़े बारह वर्ष तक दुखों का सहन किया। यह सब उन्होंने किसी कौम के लिए नहीं अखिल संसार के लिए किया है। वे विश्व को संदेश देकर गए हैं। वे जाति के प्रति कठोर और जगत के प्रति कोमल थे। ये शब्द पंन्यास राजरक्षित विजयजी ने अठवा लाइंस जैन संघ में कहा। अठवा लाइंस जैन संघ में आचार्य हंसकीर्ति विजयजी महाराज की निश्रा में भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणकों मनाया गया। इस अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। पंन्यास राजरक्षित विजय ने कहा कि काम, क्रोध और अहंकार पर विजय पाना कठिन है। प्रभु महावीर कहते है कि दुश्मन पर विजय प्राप्त करे वह वीर कहा जाता है। परंतु अपने दोषों पर जो विजय प्राप्त करे वह महावीर कहा जाता है। काम और क्रोध रूपी दोष भवोभव दुर्गति देते हैं। आज लोग जातिपाति के रोग से ग्रसित हैं, उसकी दवा करते हैं। लेकिन अपने आंतरिक दोषों का दवा नहीं करते। आंतरिक दोषों को दूर करने की श्रेष्ठ दवा धर्म है।
त्याग के बिना साधना संभव नहीं : पद्मदर्शनजी
कैलाशनगरजैन संघ में पूज्य पंन्यास प्रवर श्री पद्मदर्शनजी महाराज ने प्रभु महावीर देव के कल्याणक अवसर पर प्रवचन धारा को बहाते हुए कहा कि श्रेय का दान और आसव का उन्मूलन करने के लिए प्रभु ने साधना का मार्ग स्वीकार किया था। समग्र विश्व जब दुखों और दोषों की आग से जल रहा है तो संयम ही हराभरा बाग है। शुभ और शुभ धर्म की साधना संयम जीवन के द्वारा ही हो सकती है। घर में रहकर संयम जीवन जीना संभव नहीं है। संसार के सभी संबंध दब तक त्यागोगे नहीं तब तक जगत की प्राप्ति नहीं हो सकती। प्रभु के पास राज वैभव और समृद्धि की दरिया बह रही थी। इसके बाद भी प्रभु ने जगत के तमाम जीवों को दुखों से मुक्त करने के लिए साधना का मार्ग स्वीकार किया। कर्म सत्ता के सामने धर्म सत्ता की प्रचंड शक्ति है, इस संदेश को देने के लिए दीक्षा का मार्ग स्वीकार किए थे। धर्म करने वाले के पास सात्विकता होनी चाहिए। उपसर्गों के पहाड़ टूट पड़े तो भी साधक को हिमालय की तरह अटल रहना चाहिए। कर्मों का नाश करने के लिए धर्म तप ही श्रेष्ठ है। जिससे प्रभु ने साढ़े बारह वर्ष की साधना के दौरान साढ़े ग्यारह वर्ष तक निर्जला उपवास करके कर्म को परास्त किया था। सर्व संग का त्याग किए बिना साधना सक्षम नहीं होती। सभी पापों से विराम पाने के लिए संयम का मार्ग है। संसार में आप चाहते हुए भी दर्जनों पाप करने पड़ते हैं। निष्पाप और निर्दोष जीवन जीने के लिए संयम का मार्ग स्वीकार करना चाहिए।संयम मिलने तक आचार शुद्धि और विचार शुद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

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