सूरत - श्रीउमरा जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के बलर फार्म में निर्मित सूरी प्रेम-भुवनभानु जितेंद्र प्रव्रज्या नगरी में दांता निवासी गजीबेन अंबालाल तलकचंद परिवार द्वारा आयोजित प्रव्रज्या पर्व के आखिरी दिन दीक्षा दानेश्वरी आचार्य गुणरत्नसूरी, वैराग्य वारिधि आचार्य कुलचंद्र सूरीश्वर, 8 आचार्य भगवंतो, 300 से अधिक साधु-साध्वी भगवंतों के सानिध्य में और 10 हजार से अधिक भाई-बहनों की मौजूदगी में 14 मुमुक्षुओं ने संसार का त्याग कर भगवान महावीर के संयम वेश को धारण किया। इस अवसर पर चारों ओर से संयम धर्म की जय-जयकार के नारे गूंजने लगे। इसके साथ दीक्षा दानेश्वरी के दीक्षा का आंकड़ा 384 तक पहुंच चुका है। इस अवसर पर मंडप में विराजित आचार्य भगवंतों में आचार्य पुण्यरत्नसूरी, आचार्य यशोरत्नसूरी, आचार्य रविरत्न सूरी, मार्ग दर्शक आचार्य रश्मिरत्नसूरी, आचार्य हंसकीर्ति सूरी, आचार्य रश्मिराज सूरी, 120 भगवंतों, प्रवर्तिनी साध्वी पुण्यरेखा एवं 200 से अधिक साध्वी भगवंत उपस्थित थे।
सुबह प्रव्रज्या नगरी में 14 मुमुक्षुओं, गुरु भगवंतों आैर परमात्मा पर अक्षत वर्षा कर प्रवेश हुआ। इसके बाद मुमुक्षुओं को तीन प्रदक्षिणा देकर दीक्षा की मंगल विधि का प्रारंभ हुआ। मंगल मुहूर्त करीब आने पर सभी मुमुक्षुओं ने यह प्रार्थना की, मेरा मुंडन करिए, हे गुरुदेव मुझे प्रव्रज्या दीजिए, हे गुरुदेव मुझे प्रभु वीर का धवल उज्ज्वल वेष दीजिए। यह तीन आदेश मांगने के बाद आचार्य गुणरत्न सूरी जी ने हित शिक्षा दी, जिस तरह से पिंजरे में बंद पंखी मुक्ति के लिए रोजाना पिंजरे को तोड़ने की कोशिश करता है, पिंजरा टूटने के बाद वह अनंत आकाश में उड़ने लगता है। इसी तरह मुमुक्षुओं ने संसार के सभी बंधन आैर मोह का त्याग कर संयम के मुक्त आकाश में उड़ने के लिए बेताब हैं। संसार के सुख को छोड़कर कठोर साधना के मार्ग पर चलने को तैयार है। अनंता देव-गुरु आैर सकल संघ के आशीर्वाद उनके साथ हैं।
मंडप में प्रवेश करते ही गूंजने लगा नूतन दीक्षित जय का नाद - 8बजे प्रत्येक मुमुक्षु को गुरुदेव ने रजोहरण प्रदान की। इस अवसर पर वेष परिवर्तित कर सभी 14 मुमुक्षुओं ने भगवान महावीर के संयम धर्म का वेश धारण कर अपनी नजरें नीची रखते हुए मंडप में प्रवेश किया तब 'नूतन दीक्षित का जय-जयकार' का नाद चारों तरफ गूंज उठा। केश लुंचन आैर नामकरण का विधान हुआ। इससे पूर्व नंदी सूत्र का मंगलपाठ सुनाया गया। सभी मुमुक्षुओं को कुंकू चावल से विजय तिलक किया गया।
सुबह प्रव्रज्या नगरी में 14 मुमुक्षुओं, गुरु भगवंतों आैर परमात्मा पर अक्षत वर्षा कर प्रवेश हुआ। इसके बाद मुमुक्षुओं को तीन प्रदक्षिणा देकर दीक्षा की मंगल विधि का प्रारंभ हुआ। मंगल मुहूर्त करीब आने पर सभी मुमुक्षुओं ने यह प्रार्थना की, मेरा मुंडन करिए, हे गुरुदेव मुझे प्रव्रज्या दीजिए, हे गुरुदेव मुझे प्रभु वीर का धवल उज्ज्वल वेष दीजिए। यह तीन आदेश मांगने के बाद आचार्य गुणरत्न सूरी जी ने हित शिक्षा दी, जिस तरह से पिंजरे में बंद पंखी मुक्ति के लिए रोजाना पिंजरे को तोड़ने की कोशिश करता है, पिंजरा टूटने के बाद वह अनंत आकाश में उड़ने लगता है। इसी तरह मुमुक्षुओं ने संसार के सभी बंधन आैर मोह का त्याग कर संयम के मुक्त आकाश में उड़ने के लिए बेताब हैं। संसार के सुख को छोड़कर कठोर साधना के मार्ग पर चलने को तैयार है। अनंता देव-गुरु आैर सकल संघ के आशीर्वाद उनके साथ हैं।
मंडप में प्रवेश करते ही गूंजने लगा नूतन दीक्षित जय का नाद - 8बजे प्रत्येक मुमुक्षु को गुरुदेव ने रजोहरण प्रदान की। इस अवसर पर वेष परिवर्तित कर सभी 14 मुमुक्षुओं ने भगवान महावीर के संयम धर्म का वेश धारण कर अपनी नजरें नीची रखते हुए मंडप में प्रवेश किया तब 'नूतन दीक्षित का जय-जयकार' का नाद चारों तरफ गूंज उठा। केश लुंचन आैर नामकरण का विधान हुआ। इससे पूर्व नंदी सूत्र का मंगलपाठ सुनाया गया। सभी मुमुक्षुओं को कुंकू चावल से विजय तिलक किया गया।

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