Monday, 11 December 2017

प्रभु की उपासना के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य : ज्ञानरश्मि विजय जी

सूरत - रांदेरस्थित ओलंपिया टावर में श्रावकों को संबोधित करते हुए ज्ञानरश्मि विजय जी ने कहा कि प्रभु की आज्ञा का परिपूर्ण पालन आैर उपासना के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य है। मन, वचन आैर काया के त्रिकरण योग ने जिनेश्वर भगवंतों के तारक उपदेश का श्रद्धाभाव से श्रवण करना चाहिए। ज्ञानरश्मि जी ने कहा कि प्रभु की शरण में जाने के लिए सबसे श्रेष्ठ माध्यम ही उनकी आज्ञा का अटूट पालन किया जाए। तीर्थंकर परमात्मा की आज्ञा का शुद्ध पालन जीवन कल्याण का मार्ग सरल करता है। तीर्थंकरों के विषय में ज्ञानरश्मि जी ने कहा कि भवोभव के जो मार्ग है उस पर वह चल चुके हैं, वह खुद भी उन रास्तों से बाहर आए हैं आैर जो उनके चरण में गया, जिन्होंने उनकी शरण हासिल की, उनको भी उन्होंने मुक्ति दी। प्रभु की भावोद्धारक आज्ञा आैर उनकी वाणी के प्रति श्रद्धा रखनेवाला मोक्ष पाता है प्रभु की शरण में जानेवाले का भव-भ्रमण रुक जाता है। अरिहंत भगवंत भले ही वर्तमान में हमारे बीच सदेह मौजूद हों पर उनकी अनुपस्थिति मूर्ति के स्वरूप आैर आज्ञा के रूप में सभी स्थानों पर मौजूद रहते हैं। हीरा-मोती से भी मूल्यवान अगर कोई चीज है तो वह है सुदेव गुरु धर्म के प्रति हमारी आस्था। यह अटूट आस्था ही हमारे लिए मुक्ति का माध्यम है। 

योगी बनाने की शक्ति प्रभु पार्श्वनाथ में है : पद्मदर्शन विजय 
बलेश्वर स्थित श्री लब्धि विक्रम राज्यसूरी जैन तीर्थधाम में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के पोष दशमी के अवसर पर 250 से अधिक तपस्वी पद्मदर्शन विजय जी के साथ जुड़े। इस अवसर पर पद्मदर्शन जी ने कहा कि भोगी को योगी बनाने की शक्ति पार्श्वनाथ प्रभु की है। मुसीबतों को दूर करने का अगर आज के समय में किसी में सामर्थ्य है तो वह केवल पार्श्व प्रभु में हैं। आज अधिकतर लोग समस्या ग्रस्त हैं। कर्मों से अधिक भयानक कुसंस्कार है। कुसंस्कार के हमले में अच्छे-अच्छे योगी भी भ्रष्ट हो जाते हैं। इस संसार यात्रा में मूल संस्कार यात्रा है। हमें इस जन्म में कुसंस्कारों के उन्मूलन के लिए साधना करनी है। अगर हम इन कुसंस्कारों को खत्म नहीं करेंगे तो कुछ लोग भ्रमित कर देंगे। पद्मदर्शन जी ने कहा कि फिलहाल तो कदम-कदम पर कमजोर अवसर आपको भ्रमित करने, पथभ्रष्ट करने के लिए तैयार बैठे हैं। टीवी, इंटरनेट, वॉट्सएप आैर फेसबुक ने इंसानी जिंदगी को तबाह करके रख दिया है। भोगवाद ने सूरमाओं को भी अपनी चपेट में ले रखा है। जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है, उसका उपयोग करना सीखें। उन्होंने सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं काे संस्कारों को अपने जीवन में उतारने का उपदेश दिया। 
भाव धर्म जिन शासन का महत्वपूर्ण भेंट है : ज्ञानरश्मि विजय जी
शहर के रांदेर स्थित ओलंपिया टावर में श्रावकों को संबोधित करते हुए ज्ञानरश्मि विजय जी ने कहा कि विश्व वत्सल जिनशासन की दुनिया को सबसे महत्वपूर्ण भेंट है 'भाव धर्म'। भाव धर्म यानी श्रद्धा आैर विश्वास। बिना श्रद्धा के कोई भी धार्मिक क्रिया लाभदायक नहीं होती है। हम जीवन में जिस तरह कई मामलों में वकील, डॉक्टर, पुलिस आैर ड्राइवर आदि पर अपने कार्यों के लिए विश्वास रखते हैं, इसी तरह हमें जिनशासन की उन्नत तप-जप आराधना में श्रद्धा रखा इतना ही जरूरी है। बिना श्रद्धा रखे हम अपनी कोई धार्मिक क्रिया नहीं कर सकते। 

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