Monday, 13 November 2017

ओलंपिया संघ में जप, तप और समूह सामयिक कराया गया

सूरत| भव्यात्मासंसार की भयावहता से बाहर निकलने के लिए तरसती रहती है। जड़ और चेतन का मर्मस्पर्शी ज्ञान पाने के लिए सद्गुरु का साथ जरूरी है। जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, वध और मोक्ष ये नौ तत्वों का विशिष्ट विवेचन जिसके रोम-रोम में फैल जाए वह कयासों का त्याग करने के लिए तत्पर होता है। ये शब्द मुनि ज्ञानरश्मिविजय ने ओलंपिया जैन संघ में सोमवार को कहा। 
ओलंपिया जैन संघ में सोमवार को मुनि ज्ञानरश्मिविजय की निश्रा में भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणक मनाया गया। इस अवसर पर उन्होंने भगवान के जीवन के मर्म को समझाते हुए कहा कि चरित्र बिना मुक्ति नहीं। जीव कभी संसार में आसक्त नहीं हो सकता। परिग्रह का त्याग क्षण मात्र में करके वह संयम के मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हो जाता है। जिसके मन में कल्याण की भावना है वही कठिन साधना के लिए तैयार होता है। सम्यक पाने के बाद अपेक्षाएं जिसके 27 भवोंं शास्त्रों में वर्णन किया गया है। ये वर्तमान चौबीस के अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर का जीवन प्रेरणा स्त्रोत है। इनके कर्म का क्षय मात्र 32 वर्ष की उम्र में होने से दीक्षा ली थीं। सोलह हजार राजा इनकी आज्ञा का पान करते थे। छह खंड के मालिक मुनिवर के भव से 1 लाख, 80 हजार और 645 मासक्षमण की तपस्या की थी। साढ़े बारह वर्ष की साधना के बाद केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म तीर्थ की स्थापना करके कई जीवों का उद्धार किया। भगवान के दीक्षा कल्याणक के कारण संघ में श्रावकों ने जप, तप और समूह सामयिक किए। 

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