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Sunday, 18 March 2018
जैन धर्म परिचय , अहिंसा ओर सिदान्त
संघ-व्यवस्था का निर्माण किया:- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विघ संघ कहलाया। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में देह त्याग किया। भगवान महावीर के काल में ही विदेहियों और श्रमणों की इस परंपरा का नाम जिन (जैन) पड़ा, अर्थात जो अपनी इंद्रियों को जीत लें।
1: अहिंसा: जैन धर्म में अहिंसा संबंधी सिद्धान्त प्रमुख है। मन, वचन तथा कर्म से किसी के प्रति असंयत व्यवहार हिंसा है। पृथ्वी के समस्त जीवों के प्रति दया का व्यवहार अहिंसा है। इस सिद्धांत के आधार पर ही जियो और जीने दो का सिद्धांत परिकल्पित हुवा है |
जैन धर्म के अनुसार ईश्वर सृष्टिकर्ता नहीं है। सृष्टि अनादि काल से विद्यमान है। संसार के सभी प्राणी अपने-अपने संचित कर्मों के अनुसार फल भोगते हैं। कर्म फल ही जन्म-मृत्यु का कारण है। कर्म फल से छुटकारा पाकर ही व्यक्ति निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है। जैन धर्म में संसार दुखमूलक माना गया है। दु:ख से छुटकारा पाने के लिए संसार का त्याग आवश्यक है। कर्म फल से छुटकारा पाने के लिए त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक बताया गया है। त्रिरत्न: सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन व सम्यक आचरण जैन धर्म के त्रिरत्न हैं। सम्यक ज्ञान का अर्थ है शंका विहीन सच्चा व पूर्ण ज्ञान। सम्यक दर्शन का अर्थ है सत् तथा तीर्थंकरों में विश्वास। सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दु:ख के प्रति समभाव सम्यक आचरण है। जैन धर्म के अनुसार त्रिरत्नों का पालन करके व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है और मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। त्रिरत्नों के पालनार्थ आचरण की पवित्रता पर विशेष बल दिया गया है। जैन धर्म अनादिकाल से अहिंसा का समर्थक रहा है अहिंसा का सामान्य अर्थ है 'हिंसा न करना'। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन मे किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी कि हिंसा न करना, यह अहिंसा है| जैन धर्म में अहिंसा का बहुत महत्त्व है। अहिंसा परमो धर्म: - अहिंसा परम (सबसे बड़ा) धर्म कहा गया है। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिये जो आन्दोलन चलाया वह काफी सीमा तक अहिंसात्मक था। जब कभी ' अहिंसा ' पर चर्चा होती है , भगवान बुद्ध, भगवान महावीर और महात्मा गांधी को याद किया जाता है। अक्सर देखा गया है कि धर्म प्रवर्तक उपदेश तो देते हैं , लेकिन खुद वे उन पर चल नहीं पाते। यह बात महावीर , बुद्ध व गांधी पर लागू नहीं होती। इन तीनों ही युग पुरुषों ने अहिंसा के महत्व को समझा , उसकी राह पर चले और इसके अनुभवों के आधार पर दूसरों को भी इस राह पर चलने को कहा। अहिंसा की पहचान उनके लिए सत्य के साक्षात्कार के समान थी। अपने युग में यज्ञों में होने वाली हिंसा से महावीर के मन को गहरी चोट पहुंची , इसलिए उन्होंने अहिंसा का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसके प्रचार के लिए उन्होंने श्रमणों का संघ तैयार किया , जिन्होंने मनुष्य जीवन में अहिंसा के महत्व को बताया। सामान्यत: अहिंसा का अर्थ किसी प्राणी की मन , वचन व कर्म से हिंसा न करना होता है। आदमी में अनेक बुराइयां पाई जाती हैं , जिनकी गिनती करना असंभव है। इन बुराइयों की जड़ में मुख्य पांच दोष मिलेंगे। बाकी सभी दोष इन्हीं से पैदा होते हैं। ये दोष हैं चोरी , झूठ , व्यभिचार , नशाखोरी व परिग्रह यानी धन इकट्ठा करना। इन्हीं बुराइयों के कारण मनुष्य न जाने और किन-किन बुराइयों में लगा रहता है। हिंसा इनमें सबसे बड़ी बुराई है। हिंसा , अहिंसा की विरोधी है। इसका अर्थ सिर्फ किसी प्राणी की हत्या या उसे शारीरिक चोट पहुँचाना ही नहीं होता। महावीर ने इसका व्यापक अर्थ किया कि यदि कोई आदमी अपने मन में किसी के प्रति बुरी भावना रखता है , बुरे व कटु वचन बोलता है , तो वह भी हिंसा ही करता है। सभी प्राणी जीना चाहते हैं , अहिंसा उनको अमरता देती है। अहिंसा जगत को रास्ता दिखाने वाला दीपक है। यह सभी प्राणियों के लिए मंगलमय है। अहिंसा माता के समान सभी प्राणियों का संरक्षण करने वाली , पाप नाशक व जीवन दायिनी है। अहिंसा अमृत है। इस प्रकार महावीर ने अहिंसा की व्याख्या की।
Thursday, 11 January 2018
17 साल की उम्र में घर छोड़ने तैयारी-17 साल की उम्र में घर छोड़ने तैयारी
निमित की नजर में खुशी
मान लीजिए आपने महंगी से महंगी कार खरीदी तो क्षणिक खुशी महसूस होगी, लेकिन यदि हादसा हो जाए तो आपकी खुशी से दुख होने लगेगा। तब लगेगा कि इतनी महंगी गाड़ी कबाड़ हो गई और आपकी खुशी काफूर हो जाएगी। खुशी क्या है? यह इंसान का अंतर्मन तय करता है न कि भौतिक दुनिया।
Monday, 13 November 2017
ओलंपिया संघ में जप, तप और समूह सामयिक कराया गया
सूरत| भव्यात्मासंसार की भयावहता से बाहर निकलने के लिए तरसती रहती है। जड़ और चेतन का मर्मस्पर्शी ज्ञान पाने के लिए सद्गुरु का साथ जरूरी है। जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, वध और मोक्ष ये नौ तत्वों का विशिष्ट विवेचन जिसके रोम-रोम में फैल जाए वह कयासों का त्याग करने के लिए तत्पर होता है। ये शब्द मुनि ज्ञानरश्मिविजय ने ओलंपिया जैन संघ में सोमवार को कहा।
ओलंपिया जैन संघ में सोमवार को मुनि ज्ञानरश्मिविजय की निश्रा में भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणक मनाया गया। इस अवसर पर उन्होंने भगवान के जीवन के मर्म को समझाते हुए कहा कि चरित्र बिना मुक्ति नहीं। जीव कभी संसार में आसक्त नहीं हो सकता। परिग्रह का त्याग क्षण मात्र में करके वह संयम के मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हो जाता है। जिसके मन में कल्याण की भावना है वही कठिन साधना के लिए तैयार होता है। सम्यक पाने के बाद अपेक्षाएं जिसके 27 भवोंं शास्त्रों में वर्णन किया गया है। ये वर्तमान चौबीस के अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर का जीवन प्रेरणा स्त्रोत है। इनके कर्म का क्षय मात्र 32 वर्ष की उम्र में होने से दीक्षा ली थीं। सोलह हजार राजा इनकी आज्ञा का पान करते थे। छह खंड के मालिक मुनिवर के भव से 1 लाख, 80 हजार और 645 मासक्षमण की तपस्या की थी। साढ़े बारह वर्ष की साधना के बाद केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म तीर्थ की स्थापना करके कई जीवों का उद्धार किया। भगवान के दीक्षा कल्याणक के कारण संघ में श्रावकों ने जप, तप और समूह सामयिक किए।
ओलंपिया जैन संघ में सोमवार को मुनि ज्ञानरश्मिविजय की निश्रा में भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणक मनाया गया। इस अवसर पर उन्होंने भगवान के जीवन के मर्म को समझाते हुए कहा कि चरित्र बिना मुक्ति नहीं। जीव कभी संसार में आसक्त नहीं हो सकता। परिग्रह का त्याग क्षण मात्र में करके वह संयम के मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हो जाता है। जिसके मन में कल्याण की भावना है वही कठिन साधना के लिए तैयार होता है। सम्यक पाने के बाद अपेक्षाएं जिसके 27 भवोंं शास्त्रों में वर्णन किया गया है। ये वर्तमान चौबीस के अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर का जीवन प्रेरणा स्त्रोत है। इनके कर्म का क्षय मात्र 32 वर्ष की उम्र में होने से दीक्षा ली थीं। सोलह हजार राजा इनकी आज्ञा का पान करते थे। छह खंड के मालिक मुनिवर के भव से 1 लाख, 80 हजार और 645 मासक्षमण की तपस्या की थी। साढ़े बारह वर्ष की साधना के बाद केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म तीर्थ की स्थापना करके कई जीवों का उद्धार किया। भगवान के दीक्षा कल्याणक के कारण संघ में श्रावकों ने जप, तप और समूह सामयिक किए।
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