शांतिदूत की अमृतवाणी से पावन हो गया अमृता विद्यालयमपश्चिम वर्धमान जिले का दुर्गापुर आचार्यश्री के चरणरज से हुआ पावन पानागढ़ से लगभग पन्द्रह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री पधारे दुर्गापुर के विधाननगर विधाननगर स्थित अमृता विद्यालयम् आचार्यश्री के मंगल प्रवास से हुआ पावन अमृता विद्यालयम में आचार्यश्री की अमृतवाणी का श्रद्धालुओं ने किया रसपान
विधाननगर, दुर्गापुर, पश्चिम वर्धमान (पश्चिम बंगाल)ः जन-जन के मानस में दया, शांति, सौहार्द और भाईचारे का भाव भरने निकले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ वर्तमान में पश्चिम बंगाल से पश्चिम दिशा की ओर निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। प्रवर्धमान अहिंसा यात्रा अभी पश्चिम वर्धमान जिले को अपने प्रणेता के मंगल संदेशों से गूंजायमान बना रही है।
शनिवार को पश्चिम दिशा की ओर बढ़ते महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के ज्योतिचरण पानागढ़ बाजार हिन्दी हाईस्कूल से प्रातः की मंगल बेला में विहार किया। आज का विहार भी लगभग पन्द्रह किलोमीटर के आसपास था। गत दिनों से खराब मौसम का असर भी साफ दिखाई दे रहा था। आसमान बादलों से ढंका हुआ था और उन्हीं बादलों के बीच कहीं सूर्य भी फंसा हुआ था, किन्तु बंग धरा गतिमान आध्यात्मिक जगत के महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी अपने गंतव्य की ओर गतिमान हो चुके थे। रास्ते में आने वाले गांव के ग्रामीणों को पर आशीष वृष्टि करते आचार्यश्री लगभग पन्द्रह किलोमीटर की दूरी तय कर पश्चिम वर्धमान जिले के दुर्गापुर पहुंचे। जहां विधाननगर स्थित अमृता विद्यालयम् को आचार्यश्री के पावन प्रवास का सुअवसर प्राप्त हुआ।
आचार्यश्री ने विद्यालय प्रांगण में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि शास्कार ने समित शब्द का प्रयोग किया है। समित कौन होता है? जो व्यक्ति सम्यक् प्रवृत्ति वाला हो, वह समित होता है। जो आदमी प्राणों का अतिपात न करे, जो जीवों का रक्षक हो, वह समित होता है। इस दुनिया में शरीर से ही हिंसा मानों जुड़ी हुई है। भला दुनिया में शायद ऐसा कोई नहीं जो पूर्ण से अहिंसक हो। शरीरधारी से किसी न किसी रूप में हिंसा हो जाती है। साधारण गृहस्थों की क्या बात, कभी अहिंसा के पुजारी साधुओं से भी हिंसा हो सकती है। मानों गृहस्थ का जीवन हिंसा से संपृक्त होता है। शरीरधारी के लिए हिंसा से बचना मुश्किल होता है। इसलिए आदमी को हिंसा का अल्पीकरण करने का प्रयास करना चाहिए।
गृहस्थ अपने प्रत्येक कार्य पर ध्यान दे, तो वह बहुत सी अनावश्यक हिंसा से अपना बचाव कर सकता है। धान आदि के उपयोग से पूर्व जीव न होने की पुष्टि कर ले। पानी का अनावश्यक अपव्यय करने का प्रयास न करे, हरियाली पर चलने से बचने का प्रयास करे तो वह हिंसा से काफी हद तक बच सकता है। आचार्यश्री ने दो प्रकार की हिंसा-आरम्भज और संकल्पज का वर्णन करते हुए कहा कि मानव जीवन को चलाने के लिए की जाने वाली हिंसा आरम्भज हिंसा होती है, जबकि क्रोध, मान, लोभ में की जाने वाली हिंसा संकल्पजा हिंसा हो जाती है। आदमी को संकल्पजा हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने गुस्से को कम करने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा सभी जीवों के लिए कल्याणकारी होती है। जिस आदमी के जीवन में अहिंसा आ गई, वह समित कहलाने का अधिकारी बन सकता है।
आचार्यश्री ने द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा का भी वर्णन करते हुए कहा कि अहिंसा के प्रति जागरूक रहने के बाद भी जो हिंसा हो जाए वह द्रव्य हिंसा होती है तथा हिंसा न होने पर भी भावात्मक रूप से हिंसा का प्रयास किया जाना भाव हिंसा होती है। आदमी को भाव हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने लोगों को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में अहिंसा यात्रा के संकल्पत्रयी भी आ जाए तो आदमी का जीवन अच्छा बन सकता है। आदमी अपने भीतर अहिंसा का विकास करने का प्रयास करे तो जीवन का कल्याण हो सकता है।
शनिवार को पश्चिम दिशा की ओर बढ़ते महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के ज्योतिचरण पानागढ़ बाजार हिन्दी हाईस्कूल से प्रातः की मंगल बेला में विहार किया। आज का विहार भी लगभग पन्द्रह किलोमीटर के आसपास था। गत दिनों से खराब मौसम का असर भी साफ दिखाई दे रहा था। आसमान बादलों से ढंका हुआ था और उन्हीं बादलों के बीच कहीं सूर्य भी फंसा हुआ था, किन्तु बंग धरा गतिमान आध्यात्मिक जगत के महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी अपने गंतव्य की ओर गतिमान हो चुके थे। रास्ते में आने वाले गांव के ग्रामीणों को पर आशीष वृष्टि करते आचार्यश्री लगभग पन्द्रह किलोमीटर की दूरी तय कर पश्चिम वर्धमान जिले के दुर्गापुर पहुंचे। जहां विधाननगर स्थित अमृता विद्यालयम् को आचार्यश्री के पावन प्रवास का सुअवसर प्राप्त हुआ।
आचार्यश्री ने विद्यालय प्रांगण में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि शास्कार ने समित शब्द का प्रयोग किया है। समित कौन होता है? जो व्यक्ति सम्यक् प्रवृत्ति वाला हो, वह समित होता है। जो आदमी प्राणों का अतिपात न करे, जो जीवों का रक्षक हो, वह समित होता है। इस दुनिया में शरीर से ही हिंसा मानों जुड़ी हुई है। भला दुनिया में शायद ऐसा कोई नहीं जो पूर्ण से अहिंसक हो। शरीरधारी से किसी न किसी रूप में हिंसा हो जाती है। साधारण गृहस्थों की क्या बात, कभी अहिंसा के पुजारी साधुओं से भी हिंसा हो सकती है। मानों गृहस्थ का जीवन हिंसा से संपृक्त होता है। शरीरधारी के लिए हिंसा से बचना मुश्किल होता है। इसलिए आदमी को हिंसा का अल्पीकरण करने का प्रयास करना चाहिए।
गृहस्थ अपने प्रत्येक कार्य पर ध्यान दे, तो वह बहुत सी अनावश्यक हिंसा से अपना बचाव कर सकता है। धान आदि के उपयोग से पूर्व जीव न होने की पुष्टि कर ले। पानी का अनावश्यक अपव्यय करने का प्रयास न करे, हरियाली पर चलने से बचने का प्रयास करे तो वह हिंसा से काफी हद तक बच सकता है। आचार्यश्री ने दो प्रकार की हिंसा-आरम्भज और संकल्पज का वर्णन करते हुए कहा कि मानव जीवन को चलाने के लिए की जाने वाली हिंसा आरम्भज हिंसा होती है, जबकि क्रोध, मान, लोभ में की जाने वाली हिंसा संकल्पजा हिंसा हो जाती है। आदमी को संकल्पजा हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने गुस्से को कम करने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा सभी जीवों के लिए कल्याणकारी होती है। जिस आदमी के जीवन में अहिंसा आ गई, वह समित कहलाने का अधिकारी बन सकता है।
आचार्यश्री ने द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा का भी वर्णन करते हुए कहा कि अहिंसा के प्रति जागरूक रहने के बाद भी जो हिंसा हो जाए वह द्रव्य हिंसा होती है तथा हिंसा न होने पर भी भावात्मक रूप से हिंसा का प्रयास किया जाना भाव हिंसा होती है। आदमी को भाव हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने लोगों को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में अहिंसा यात्रा के संकल्पत्रयी भी आ जाए तो आदमी का जीवन अच्छा बन सकता है। आदमी अपने भीतर अहिंसा का विकास करने का प्रयास करे तो जीवन का कल्याण हो सकता है।
जैन तेरापंथ न्यूज़ से साभार

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