इन्द्रियों की गुलामी से बचने का प्रयास करे आदमी: आचार्यश्री महाश्रमण
आज भी सूर्य आसमान से रहा नदारद, गर्मी और उमस में आई कमी –सेंट अर्नाल्डस हाइस्कूल परिसर में आचार्यश्री ने इन्द्रियों का संयम करने का दिया ज्ञान
मेदारमेत्ला, प्रकाशम् (आंध्रप्रदेश)08जुंन 2018 :

धीरे-धीरे वर्ष 2018 के चातुर्मास के लिए भारत के दक्षिणी हिस्से के सबसे बड़े महानगर चेन्नई की ओर बढ़ती अहिंसा यात्रा अपने प्रणेता जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, शांतिदूत, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी व उनकी धवल सेना के साथ आंध्रप्रदेश के प्रकाशम् जिले मंे गतिमान है। सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति जैसे तीन कल्याणकारी संदेशों का प्रभाव जिन-जिन क्षेत्रों पर पड़ रहा है, वहां के वातावरण में बदलाव नजर आने लग रहा है। आचार्यश्री के मंगल प्रवचनों से प्रभावित होकर ग्रामीण जनता भी अपनी चेतना को आध्यात्मिकता के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक नजर आ रही है। भाषाई कठिनाई के बावजूद भी क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के मुख से सुनकर अथवा अहिंसा यात्रा के तेलगु भाषा में प्रकाशित परिचय पत्र के माध्यम से जानकारी मिलने के उपरान्त वे श्रद्धा से प्रणत होते हैं और आशीर्वाद से पावन आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रातः की मंगल बेला में आचार्यश्री ने मोप्पोवरम् से प्रस्थान किया। अपनी धवल सेना के साथ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 16 पर लगभग 12.5 किलोमीटर का विहार कर प्रकाशम् जिले के ही मेडारमेत्ला गांव स्थित सेंट आर्नाल्ड हाइस्कूल में पधारे।
विद्यालय परिसर में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को एक सीमा तक अपनी इन्द्रियों का संयम करने का प्रयास करना चाहिए। खाने-पीने, भोग-विलास आदि में आदमी को संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। राजा को भी एक सीमा तक इन्द्रिय संयम करने का प्रयास करना चाहिए। यदि राजा इन्द्रियों के वशीभूत होकर भोग-विलास में लिप्त हो जाए तो वह भला अपने राज्य का कितना भला कर सकेगा। आचार्यश्री ने रसनेन्द्रिय के वशीभूत एक राजा के अकालमृत्यु की कथा सुनाकर लोगों को उत्प्रेरित करते हुए कहा कि पांच ज्ञानेन्द्रियां बताई गई हैं-नाक, कान, आंख, जीभ और त्वचा। यह इन्द्रियां आदमी को उत्पथ की ओर भी ले जानी वाली हो सकती हैं तो यह इन्द्रियां ज्ञान का माध्यम भी बन सकती हैं। आदमी को इन्द्रियों का गुलाम नहीं होना चाहिए। आदमी को अपने इन्द्रियों को संयमित रखने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आदमी को अपने इन्द्रियों को अपने वश में रखने और उनका सदुपयोग करने का प्रयास करना होगा। आंखों से अनावश्यक न देखना, कानों से किसी की बुराई आदि सुनने से बचना, खाने में ज्यादा रस नहीं लेना आदि। आदमी अपनी इन्द्रियों का संयम करने का प्रयास करे तो पावनता को भी प्राप्त कर सकता है।
साभार - जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा ब्रॉड कास्ट
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