उधना में आयोजित बालिका संस्कार निर्माण शिविर में "शासन श्री" साध्वी श्री ललितप्रभाजी, "शासन श्री" साध्वी श्री शिवमालाजी एवं समणी श्री विनीतप्रज्ञाजी का उद्बोधन
तेरापंथी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री हंसराजजी बेताला,उपाध्यक्ष श्री गौतम जी सालेचा एवं ट्रस्टी श्री संजय जी सुराणा का मार्गदर्शन
महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या "शासन श्री" साध्वी श्री ललितप्रभाजी, "शासन श्री" साध्वी श्री शिवमालाजी एवं समणी श्री विनीतप्रज्ञा जी के निर्देशन में तेरापंथी महासभा द्वारा प्रेरित एवं श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, उधना द्वारा आयोजित पंचदिवसीय संस्कार निर्माण शिविर के दूसरे दिन जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री हंसराजजी बेताला, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री गौतमजी सालेचा एवं ट्रस्टी श्री संजयजी सुराणा उपस्थित रहे।
इस अवसर पर "शासन श्री" साध्वी श्री ललित प्रभा जी ने कहा - जीवन में जैन संस्कारों का विशेष महत्व है। जैन धर्म सबके साथ मैत्री की प्रेरणा देता है। जैन धर्म किसी के प्रति रागद्वेष न रखने की सीख देता है। जैन धर्म ने अनेकांत दर्शन की भेंट दी है। अनेकांत दर्शन प्रत्येक व्यक्ति के विचारों को आदर देना सिखाता है। स्वस्थ समाज संरचना एवं सुखमय जीवन के लिए इन संस्कारों की सुरक्षा जरूरी है।
"शासन श्री" साध्वी श्री शिवमालाजी ने कहा - जैन बालक एवं बालिकाएं अपने संस्कारों द्वारा अपनी विशेष पहचान बनाएं। तन की सजावट ब्यूटी पार्लर में जाकर हो सकती है, घर की सजावट फैशन डिजाइनर के द्वारा हो जाएगी, लेकिन जीवन की सजावट कौन करेगा ? जीवन की सजावट केवल और केवल जैनत्व के संस्कारों द्वारा ही हो पाएगी। हमें मोती जैसा मनुष्य जन्म मिला है। हीरे समान जगमगाता हुआजैन धर्म मिला है। उसके सिद्धांतों का एवं आदर्शों का जीवन में आचरण करना हमारा कर्तव्य है।
समणी श्री विनीतप्रज्ञा जी ने कहा - मनुष्य पूर्व जन्मों के संस्कार लेकर जन्म लेता है। उसके संस्कारों को बदलना यह काफी कठिन कार्य है। लेकिन वह असंभव नहीं है। संकल्प और निष्ठा के द्वारा इनमें परिवर्तन संभव है। उन्होंने जैन जीवन शैली के नौ सूत्रों को जीवन में उतारने की सीख देते हुए मांसाहार अंडे आदि से दूर रहने की एवं आहारशुद्धि की प्रेरणा दी।
महासभा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री हंसराज जी बेताला ने कहा - जैन संस्कार जीवन को जीने लायक बनाते हैं।संस्कार का मतलब है जीवन का शुद्धिकरण। संस्कार सींचन का मतलब है वृत्तियों का परिष्कार-आदतों में बदलाव। संस्कार यह जीवन जीने की कला है। संस्कार निर्माण शिविर द्वारा मनुष्य का टाइम टेबल बदल जाता है। वह समय के साथ कदम मिलाना सीख जाता है। उन्होंने 563 बालिकाओं की सर्वाधिक संख्या वाला सुआयोजित एवं सफल शिविर लगाने के लिए उधना सभा एवं उसके कार्यकर्ताओं की निष्ठा की भरपूर प्रशंसा की।
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री गौतमजी सालेचा एवं महासभा ट्रस्टी श्री संजयजी सुराणा ने उधना क्षेत्र की जागरूकता की अनुमोदना की।
तेरापंथी सभा, उधना के अध्यक्ष श्री बसंतीलालजी नाहर ने स्वागत वक्तव्य में स्थानीय कार्यकर्ताओं के श्रम की सराहना की। उन्होंने केंद्र द्वारा निर्देशित प्रत्येक निर्देश की अनुपालन हेतु उधना सभा की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
महासभा गुजरात प्रभारी श्री लक्ष्मीलालजी बाफना, इस शिविर के केंद्रीय संयोजक श्री अनिलजी चंडालिया, उधना प्रभारी श्री नानालाल जी राठौड़ आदि ने प्रासंगिक भावाभिव्यक्ति की। श्री प्रकाशजी डाकलिया ने मधुर गीत का संगान किया।महिला मंडल की बहनों ने मंगलाचरण किया।
विशेष कार्यकर्ता संगोष्ठी में सभा के संरक्षक श्री मोहनजी पोरवाड़, श्री पारसजी संचेती, श्री अर्जुनजी मेड़तवाल, श्री जवेरीलाल जी दुगड़ आदिने अपने भाव प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम का संचालन सभा के पूर्व मंत्री श्री मिश्रीमलजी नंगावत एवं श्री अरुणजी चंडालिया ने किया।आभार ज्ञापन उधना सभा के पूर्व कोषाध्यक्ष श्री लादुलालजी नंगावत ने किया।
संकलन -- अर्जुन मेड़तवाल
उधना-सूरत


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