द्विदिवसीय प्रवास के बाद गतिमान हुई अहिंसा यात्रा, पहुंची मंगलगिरि --बापूजी विद्यालयम् से आचार्यश्री ने दिया अवमोदरिका का ज्ञान
मंगलगिरि, गुन्टुर (आंध्रप्रदेश): ‘सिटी आॅफ विक्ट्री’ विजयवाड़ा में द्विदिसीय प्रवास के दौरान विजयवाड़ा को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत कर, लोगों को शांतिमय जीवन के सूत्र प्रदान कर अपने श्रद्धालुओं की सार-संभाल करने के उपरान्त बुधवार को प्रातः अपनी अहिंसा यात्रा व धवल सेना के साथ जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के कीर्तिधर महापुरुष, एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अगले गंतव्य की ओर प्रस्थित हुए। प्रातः की बेला में भी अपने आराध्य को अपने नगर से विदा करने के लिए भी सैंकड़ों-सैंकड़ों उपस्थित थे। उनकी इच्छा तो अपने आराध्य के निकट सान्निध्य को और अधिक समय तक पाने की थी, किन्तु समताभावी, दृढ़निश्चयी आचार्यश्री को रोकने में वे खुद को सक्षम नहीं समझ पा रहे थे। सभी विजयवाड़ावासियों को दोनों करकमलों से आशीष प्रदान करते हुए आचार्यश्री बढ़ चले।
कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने के उपरान्त ही भारत की पौराणिक नदियों में एक कृष्णा नदी आ गई। इस बने पुल पर जब महातपस्वी महाश्रमणजी के मंगल चरणरज पड़े तो यह पौराणिक नदी भी अपने आपको धन्य महसूस कर रही थी। पुल को पार करने के साथ ही आचार्यश्री कृष्णा जिले की सीमा को भी अतिक्रांत किया और गुंटुर जिले की सीमा मंगल प्रवेश किया। उमस भरी गर्मी में भी लगभग साढ़े बारह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री मंगलगिरि के बापूजी विद्यालयम् में पधारे।
विद्यालय परिसर में ही बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आगम में शब्द आता है अवमोदरिका। जिसे उनोदरी भी कहा जाता है। इसका अर्थ होता है किसी भी चीज का सीमाकरण करना अथवा अल्पीकरण करना। इसके तीन प्रकार बताए गए हैं-1. उपकरण अवमोदरिका, 2. भक्तपान अवमोदरिका व 3. भाव अवमोदरिका।
आचार्यश्री ने तीनों को विस्तार से परिभाषित करते हुए कहा कि आदमी को अपने उपकरणों की सीमा करने का प्रयास करना चाहिए। वस्त्र, मकान, दुकान, धन, आभूषण आदि अपने स्वामित्व में कम रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अल्पपरिग्रही बनने का प्रयास करे। अपरिग्रह से अहिंसा की भावना पुष्ट हो सकती है। इसलिए आदमी को धीरे-धीरे परिग्रहों का सीमाकरण अथवा अल्पीकरण करने प्रयास करना चाहिए।
आदमी को खानपान में भी द्रव्यों की सीमा करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को सीमा करने का प्रयास करना चाहिए कि इतने द्रव्यों से ज्यादा नहीं खाऊंगा। खाने के दौरान भी आदमी से भूख से थोड़ा कम खाए तो उनोदरी की साधना हो सकती है। खाने में संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। अवमोदरिका अथवा उनोदरी थोड़े में ही बहुत गुण वाली होती है। संयमित भोजन से आदमी कई प्रकार की बीमारियों से भी बच सकता है। यह अहिंसात्मक भावना का भी विकास कराने वाली हो सकती है।
आदमी को भाव कर संयम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी गुस्से का संयम करने या गुस्सा न करने का संकल्प कर ले तो यह भाव अवमोदरिका हो जाती है। बोलकर झगड़ा बढ़ाने के बजाए गम खाने का प्रयास करना चाहिए। गम खाने वाला बड़ा होता है।
संप्रसारक -जैन तेरापंथी महासभा

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