मानव मार्गदर्शन - संसार निस्सार है
सांसारिक सुखों में सन्तोष कहाँ है? मन माफीक वस्तु मिल जाये तब भी सन्तोष कहाँ? दुःख तो साथ ही खड़ा रहता है। इस दुनियाँ एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो दुःखी नहीं है? हाँ पैसे वालों की अपेक्षा एक साधारण मजदूर भी सुख की नींद सोता है। दोस्तों! जहां तृष्णा है, वहाँ दुःख है। जहाँ सन्तोष है, वहीं सुख है। दो रुपया मांगने वाल भिखारी कहलाता है। दूसरी और जिसके पास दस लाख है और वह बीस लाख की कामना करता है उसे आप क्या कहेंगे? कहते है "गरीब आदमी मंदिर के बाहर भीख मांगता है और अमीर आदमी मंदिर के अन्दर भीख मांगता है।" तृष्णा का कभी अन्त होने वाला नहीं है। जैसे- जैसे उसकी पूर्ति करते जाएँगे, वैसे-वैसे वह और अधिक बढ़ती जाएगी।
वैसे तो यह संसार दुःखों की खान है। संसार दुःख में खारा और सुख में मीठा लगने लगता है। गर्भावस्था का दुःख कितना भयंकर है? पेट में गर्भ आम की तरह उल्टा लटकता रहता है। माता-बहनों को प्रसव की पीड़ा कितनी भयानक होती है? माँ सोचती है - हे भगवान! मै इस भयानक पीड़ा से कैसे मुक्त होवुंगी? बच्चा जैसे ही पैदा होता है और माता के मुँह में गुड का पानी गया नहीं की उसे सारा संसार फिर से मीठा लगने लग जाता है। मित्रों! अनादिकाल से जीव यही करता आ रहा है। करने योग्य जो है, आज तक नहीं किया। धर्म की याद ही नहीं आती।
सारा जीवन रंग राग में व्यतीत कर दिया। वह ऐसा पहनता है, में भी वैसा पहनुंगा। उसके पास होंडा सिटी गाड़ी है तो में उससे बढ़िया बी एम डब्लू गाड़ी ख़रीदूँगा। यह क्या है? देखा देखी। हर आदमी में एक होड से लग गई है। औरतों का परिवेश बदल गया है। परिधान इस तरह के हो गए हैं जिसे देखकर एक सभ्य आदमी की आंखे शर्म से झुक जाती है पर उन पहने वाली औरतों की नजरों में कोई फर्क नहीं पड़ता। आजकल के युवा वर्ग सभी पाश्चायत सभ्यता की और भाग रहे है। जिस प्रकार के भद्दे परिधान पहनते हैं सारे गुप्त अंगों को खुला रखने लग गए है। पुराने जमाने में औरतें इस प्रकार के कपड़े पहनती थी और उनका कोई भी अंग नहीं दिखाई देता था। लेकिन आज की नई पीढ़ी किधर भाग रही है। समझ से परे है। दूसरी और हम लोग सारा दिन एक दूसरों की निंदा में व्यतीत कर देते हैं। दिनभर स्त्री कथा, विदेश कथा, देश कथा, राज कथा करते रहते हैं, धर्म कथा कहाँ करते हैं? सोचते हैं, अब धर्म कथा करूंगा, मंदिर जाना शुरू करूंगा, लेकिन सोचते ही रह जाते हैं और दुनिया से बिदा हो जाते है। कैसी विडम्बना है? किसी ने ठीक ही कहा है -
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परिलय होयगो, बहुरि करे गो कब।
वास्तव में इस दुनियाँ में सभी अनाथ है। भले लम्बा चौड़ा कुटुम्ब हो, धन-वैभव और मकान हो, लेकिन धर्म में सब अनाथ है। जिसने भगवान (आत्मा) को पाने के लिए पुरुषार्थ किया है, वही नाथ है, बाकी सभी अनाथ है। तीन घण्टा पिक्चर देखने का हमारे पास समय है। पर मंदिर या सामायिक करने का हमारे पास समय नहीं है। प्रभु स्मरण का विचार कहाँ करते हैं? ऐसा विचार आ जाए तो फिर क्या कहना।
संसारी जीव को धर्म अप्रिय लगता है और संसार प्रिय प्रतीत होता है। जिसे परमात्मा की आज्ञा में चलने की रुचि हो जाती है, उसे संसार के भोगों से अरुचि हो जाती है। अतः धर्म को जीवन में उतारना होगा, तभी आत्मा का कल्याण हो सकेगा। हाँ! धर्म को भविष्य के लिए न टालें।.
सांसारिक सुखों में सन्तोष कहाँ है? मन माफीक वस्तु मिल जाये तब भी सन्तोष कहाँ? दुःख तो साथ ही खड़ा रहता है। इस दुनियाँ एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो दुःखी नहीं है? हाँ पैसे वालों की अपेक्षा एक साधारण मजदूर भी सुख की नींद सोता है। दोस्तों! जहां तृष्णा है, वहाँ दुःख है। जहाँ सन्तोष है, वहीं सुख है। दो रुपया मांगने वाल भिखारी कहलाता है। दूसरी और जिसके पास दस लाख है और वह बीस लाख की कामना करता है उसे आप क्या कहेंगे? कहते है "गरीब आदमी मंदिर के बाहर भीख मांगता है और अमीर आदमी मंदिर के अन्दर भीख मांगता है।" तृष्णा का कभी अन्त होने वाला नहीं है। जैसे- जैसे उसकी पूर्ति करते जाएँगे, वैसे-वैसे वह और अधिक बढ़ती जाएगी।
वैसे तो यह संसार दुःखों की खान है। संसार दुःख में खारा और सुख में मीठा लगने लगता है। गर्भावस्था का दुःख कितना भयंकर है? पेट में गर्भ आम की तरह उल्टा लटकता रहता है। माता-बहनों को प्रसव की पीड़ा कितनी भयानक होती है? माँ सोचती है - हे भगवान! मै इस भयानक पीड़ा से कैसे मुक्त होवुंगी? बच्चा जैसे ही पैदा होता है और माता के मुँह में गुड का पानी गया नहीं की उसे सारा संसार फिर से मीठा लगने लग जाता है। मित्रों! अनादिकाल से जीव यही करता आ रहा है। करने योग्य जो है, आज तक नहीं किया। धर्म की याद ही नहीं आती।
सारा जीवन रंग राग में व्यतीत कर दिया। वह ऐसा पहनता है, में भी वैसा पहनुंगा। उसके पास होंडा सिटी गाड़ी है तो में उससे बढ़िया बी एम डब्लू गाड़ी ख़रीदूँगा। यह क्या है? देखा देखी। हर आदमी में एक होड से लग गई है। औरतों का परिवेश बदल गया है। परिधान इस तरह के हो गए हैं जिसे देखकर एक सभ्य आदमी की आंखे शर्म से झुक जाती है पर उन पहने वाली औरतों की नजरों में कोई फर्क नहीं पड़ता। आजकल के युवा वर्ग सभी पाश्चायत सभ्यता की और भाग रहे है। जिस प्रकार के भद्दे परिधान पहनते हैं सारे गुप्त अंगों को खुला रखने लग गए है। पुराने जमाने में औरतें इस प्रकार के कपड़े पहनती थी और उनका कोई भी अंग नहीं दिखाई देता था। लेकिन आज की नई पीढ़ी किधर भाग रही है। समझ से परे है। दूसरी और हम लोग सारा दिन एक दूसरों की निंदा में व्यतीत कर देते हैं। दिनभर स्त्री कथा, विदेश कथा, देश कथा, राज कथा करते रहते हैं, धर्म कथा कहाँ करते हैं? सोचते हैं, अब धर्म कथा करूंगा, मंदिर जाना शुरू करूंगा, लेकिन सोचते ही रह जाते हैं और दुनिया से बिदा हो जाते है। कैसी विडम्बना है? किसी ने ठीक ही कहा है -
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परिलय होयगो, बहुरि करे गो कब।
वास्तव में इस दुनियाँ में सभी अनाथ है। भले लम्बा चौड़ा कुटुम्ब हो, धन-वैभव और मकान हो, लेकिन धर्म में सब अनाथ है। जिसने भगवान (आत्मा) को पाने के लिए पुरुषार्थ किया है, वही नाथ है, बाकी सभी अनाथ है। तीन घण्टा पिक्चर देखने का हमारे पास समय है। पर मंदिर या सामायिक करने का हमारे पास समय नहीं है। प्रभु स्मरण का विचार कहाँ करते हैं? ऐसा विचार आ जाए तो फिर क्या कहना।
संसारी जीव को धर्म अप्रिय लगता है और संसार प्रिय प्रतीत होता है। जिसे परमात्मा की आज्ञा में चलने की रुचि हो जाती है, उसे संसार के भोगों से अरुचि हो जाती है। अतः धर्म को जीवन में उतारना होगा, तभी आत्मा का कल्याण हो सकेगा। हाँ! धर्म को भविष्य के लिए न टालें।.
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