Thursday, 2 November 2017

मानव मार्गदर्शन - भावना

जिस समय मनुष्य के मन में जैसे भाव रहते हैं, उस समय उसके वैसे ही शुभ-अशुभ कर्मों का बन्ध होता है। शुभ भावों का शुभ और अशुभ भावों का अशुभ फल प्राप्त होता है। बिल्ली जब अपने बच्चे को मुँह में पकड़ती है तब उसके भाव शुभ होते हैं और वही बिल्ली जब किसी चूहे को पकड़ती है तो तब उसके भाव क्रूर हो जाते हैं। बिल्ली क्रिया तो एक ही कर रही होती है, किन्तु दोनों को पकड़ने के समय भाव अलग-अलग होते हैं। जिसका परिणाम भी उसे वैसा ही प्राप्त होता है
एक मछुआरा दिन भर समुद्र में जाल डालकर बैठा रहता है, पर एक भी मछली पकड़ने में कामयाब नहीं होता है। फिर भी उसे हिंसा का दोष लगता है, क्योंकि उसके मन में मछली मारने का भाव था। दूसरी और एक डॉक्टर के द्वारा ऑपरेशन के दौरान मरीज की मृत्यु हो जाती है तो भी उसे हिंसा को दोष नहीं लगता है, क्योंकि डॉक्टर तो मरीज को जीवन दान देना चाहता था, मारना नहीं। शुद्ध एवं निर्मल भावना जीवन में विकास एवं उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है। हम अपनी भावना को सदा पवित्र रखें, मन में बुरे विचार न आने दें, क्योंकि कर्म बन्ध और निर्जरा प्रतिक्षण जारी है।
 जिस प्रकार एक मोबाइल के माध्यम से नम्बर दबाते ही संदेश विधुत तरंगो के कारण सामने वाले तक पहुँच जाते हैं, वैसे ही मनोभावना की तरंगे इसी प्रकार एक दूसरे को प्रभावित करती है, हम दूसरे के प्रति जैसा अच्छा या बुरा सोचेंगे, तो उसके मन में भी हमारे प्रति वैसी ही भावना उत्पन्न होगी, अतः हमें सदा शुभ भावों का चिंतन करना चाहिए। इसी में ही हमारा आत्महित है।

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