Tuesday, 27 August 2019

खाद्य संयम दिवस - निरोगी जीवन जीने का महत्वपूर्ण रहस्य - उत्तम जैन ( विद्रोही )


खाद्य संयम दिवस - लेखक - उत्तम जैन (विद्रोही )
जब-तब खाने का भाव मिटायें |
कैसे कितना कब खाएं |
नियमित भोजन शुद्ध हवा है |
भोजन को सात्विक करना होगा |
भोजन करते समय नहीं हो,
ईर्ष्या, क्रोध, घृणा के भाव |
इनसे होते आँतों में घाव |
' संयम से खाना जीवन '
इस "वीर" वचन को रखना याद ||

तेरापंथ धर्मसंघ मे पर्युषण का प्रथम दिवस खाद्य संयम दिवस दिवस के रूप मे मनाया जाता है !  खाध्य संयम का अर्थ है खाने का संयम वेसे हमे सिर्फ इस दिन ही खाने का संयम नहीं रखना है निरोगी रहने के लिए जीवन मे खाने का संयम बहुत जरूरी है! हमे जब ही खाना खाना चाहिए जब  हमे भूख लगे   तब हम खाना खाते है तो पाचन अच्छे से होता है छोटी आंत , बड़ी आंत , पक्वाशय ,लीवर पर अतिरिक्त भार  नहीं पड़ता है फलस्वरूप हमे गेस , आम्लपित , अपचन की शिकायत नहीं होती है ! आज विज्ञान भी इससे सहमति व्यक्त करता है 
श्रावण मास में आहार संयम का महत्व:  आहार संयम निश्चित ही एक करने योग्य तप है। उपवास और बेला (दो दिन का, तीन दिन का उपवास) आदि तपस्याएं उसके अंतर्गत हैं। श्रावण-भाद्र मास में जैन लोग विशेष रूप से इस तप का प्रयोग करते हैं। यथाशक्ति, यथास्थिति वह होना भी चाहिए। कुछ लोग शारीरिक दुर्बलता अथवा अन्य व्यस्तताओं के कारण तपस्या नहीं कर पाते। उन्हें निरुत्साह होने की जरूरत नहीं। उन्हें 'ऊनोदरी' पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। निर्जरा के बारह भेदों में दूसरा भेद है ऊनोदरी। 'ऊन' का अर्थ है न्यून, कम। उदर का अर्थ है पेट। उदर को ऊन रखना, खाने में कमी करना ऊनोदरी तप है। ऊनोदरी का यही अर्थ अधिक प्रचलित है। जैन धर्म में ऊनोदरी के दो प्रकार बतलाए गए हैैैं -पहला द्रव्य अवमोदरिका एवं दूसरा भाव अवमोदरिका। यहां अवमोदरिका का भी तात्पर्य है अल्पीकरण अथवा संयम। द्रव्य अवमोदरिका का अर्थ है उपभोग में आने वाले द्रव्यों -भौतिक पदार्थों का संयम करना। भाव अवमोदरिका का संबंध हमारे अंतर्जगत से है, भावों (इमोशन्स) से है, निषेधात्मक भावों (नेगेटिव एटिच्यूड्स) के नियंत्रण से है। यह अवमोदरिका जहां जैन तपोयोग का एक अंग है, वहीं अनेक व्यावहारिक समस्याओं का समाधान भी है। कुछ लोग अनावश्यक खाते हैं, मौज उड़ाते हैं और बीमारियों को अपने घर (शरीर) में लाकर उन्हें रहने का निमंत्रण देते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें क्षुधा शांति के लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री भी नहीं मिलती। वे कष्ट का जीवन जीते हैं। अति भाव और अभाव की इस स्थिति में संतुलन हो जाए, तो दोनों ओर की समस्या का समाधान हो सकता है। इसी प्रकार वस्त्र, मकान, यान-वाहन आदि की बहुलता और अभाव की स्थितियां हैं। लड़का भर पेट भोजन कर उठा ही था कि मित्र के घर से प्रीतिभोज में भाग लेने के लिए निमंत्रण मिला। वह अपने वृद्ध पिता के पास जाकर बोला , पिता जी ! खाना इतना खा लिया है कि सांस भी नहीं ली जा रही। अब और भोजन के लिए निमंत्रण है। आप बताएं क्या करूं ? पिता ने कहा , पुत्र ! प्राणों की चिंता मत करो , जाओ भोजन करो। मुफ्त का भोजन कभी कभी  मिलता है ? शरीर तो अगले जन्म में फिर मिल जाएगा। पिता की यह व्यंग्य प्रेरणा उपभोक्तावादी संस्कृति में पलने वालों के लिए एक बोध - पाठ है। भाव अवमोदरिका , द्रव्य अवमोदरिका से कहीं अधिक मूल्यवान है। उसके उतने ही प्रकार हो सकते हैं , जितने मनुष्य के निषेधात्मक भाव होते हैं , जैसे क्रोध , लोभ , अहंकार आदि। एक बहुभोजी व्यक्ति संत के पास गया और बोला , आप अनुभवी हैं , बताइए मैं कौनसी दवा लूं जिससे भोजन ठीक तरह से पच जाए ? संत ने कहा , जब तक एक दवा नहीं लोगे ,और दवा क्या काम करेगी ? वह दवा है ऊनोदरी। तुम ज्यादा खाते हो और पाचन - क्रिया को खराब करते हो। ऊनोदरी करो , कम खाओ , पाचन के लिए यह सर्वश्रेष्ठ दवा है। ऊनोदरी जहां शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है , वहीं आध्यात्मिक साधना में भी सहायक है। दिगंबर साहित्य में कहा गया है - क्षमा , मुक्ति आदि दस धर्मों की साधना , आराधना , योग , स्वाध्याय और इंद्रिय नियंत्रण में ऊनोदरी तप सहायक बनता है। साधु का जीवन निश्चिंतता और अनिश्चितता का जीवन है। निश्चित इस रूप में कि वहां कोई चिंता नहीं होती। भिक्षा में कल क्या मिलेगा ? यह चिंता साधु नहीं करता। आज जो उपलब्ध है , उसी में संतुष्ट रहता है। अनिश्चितता इस रूप में कि मुनि को कभी सरस , कभी विरस , कभी ठंडा और कभी गरम , कभी पर्याप्त और कभी अपर्याप्त भोजन मिलता है। मुझे स्मरण है , भिक्षा में आहार कम उपलब्ध होने पर एक हमारे स्थविर संत बहुधा एक सूत्र दोहराया करते थे , थोड़े में गुण घणां - कम में बहुत गुण होते हैं। आहार कम होगा तो ऊनोदरी तप होगा , पाचन क्रिया ठीक रहेगी। वस्त्र कम हैं तो उसके साज - संभाल में समय कम लगेगा। बातों की आदत कम है तो स्वाध्याय और ध्यान में अधिक संलग्नता होगी। द्रव्य अवमोदरिका के भी दो प्रकार हैं - पहला है उपकरण द्रव्य अवमोदरिका एवं दूसरा भक्तपान अवमोदरिका। वस्त्र , पात्र आदि उपकरणों का संयम करना उपकरण द्रव्य अवमोदरिका है। एवं खान - पान में संयम करना भक्तपान द्रव्य अवमोदरिका है।खाद्य का हमारे मन मस्तिष्क पर भी असर होता है एक कहावत है " जेसा खाये अन्न वेसा होइए मन 
अर्थात खाना भी हमे सात्विक  खाना ही खाना चाहिए सात्विक खाने के साथ हमे यह भी ध्यान रखना चाहिए हमे जितनी भूख हो उससे कुछ कम खाये जिससे खाने के कम से कम 1 घंटे बाद पानी के लिए जगह बची हुई रहे साथ मे खाना हमे एक जगह बेठकर खाने के बीच मे पानी  नहीं पीना व खाते समय यह ध्यान रहे मोनव्रत रखते हुए खाने को इतना चबाये की जेसे हम खा नहीं पी रहे है अर्थार्त खाने को पियो ओर पानी को खाओ ( पानी बेठकर एक एक घूंट पीना चाहिए इन सभी संयम को हम खाध्य संयम के रूप मे ले सकते है

Friday, 23 August 2019

देश का हर नागरिक नशा मुक्त होकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करें- मुनि पुलक सागर

सूरत- पर्वत पाटिया स्थित चंद्रप्रभु जैन मंदिर के पास चल रहे ज्ञान गंगा महोत्सव के सुअवसर पर मुनि पुलक सागर महाराज ने कहा कि नशा मुक्ति अभियान सरकार की व्यवस्था ही नहीं सामाजिक जिम्मेदारी भी है नशा मुक्ति के लिए सामाजिक क्रांति की जरूरत है नशा बहुत बुरी चीज है यह जीवन की दशा ही नहीं बदलती दुर्दशा भी करती है नशे से मुक्ति मिल जाए तो भारत बहुत मजबूत बन सकता है मुनि पुलक सागर ने कहा कि आप लोग भले ही कश्मीर से कन्याकुमारी तक जमीन के टुकड़े को भारत मानते हो लेकिन मैं हर इंसान को भारत मानता हूं भारत को सुधारना है तो सड़के  सुधारने से पहले खुद को सुधारने की जरूरत है देश का हर नागरिक नशा मुक्त होकर पारिवारिक ,सामाजिक वह राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करें तो भारत का परिदृश्य ही कुछ और होगा महाराज ने कहा कि पीने वाले भले ही कुछ समय के लिए गम भूल जाते हैं लेकिन परिवार जीवन भर गम में डूबा रहता है यह दुर्भाग्य है कि जिस देश में गंगा यमुना जैसी पवित्र नदियां बहती हो  वहां आज शराब की नदिया भी वह रही है भूकंप तूफान तो कभी-कभी आते हैं लेकिन बोतल का तूफान रोज आता है शराब को परिभाषित करते हुए महाराज ने कहा की श - सड़ाएगी  रा -रुलाएगी ओर ब- बर्बाद कर देगी यानी शराब पहले सड़ाती है , रुलाती है और बर्बाद कर देती है नशा करने वालों ने भगवान महादेव को भी बदनाम कर रखा 

Thursday, 22 August 2019

साधना के लिए ज्ञान और आचार का योग आवश्यक: महायोगी आचार्यश्री महाश्रमण

सम्बोधि’ प्रवचनमाला निरंतर बढ़ रही आगे-  संवर की साधना करने को आचार्यश्री ने किया उत्प्रेरित – ‘महात्मा महाप्रज्ञ’ की भी सरस व्याख्या से श्रद्धालु हुए अभिभूत 

21.08.2019 कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): साधना के क्षेत्र में ज्ञान और आचार दोनों का होना आवश्यक होता है। ज्ञान के बिना आचार का कोई विशेष महत्त्व नहीं होता। सम्यक् ज्ञान के बिना भला अच्छे आचार की कामना की कैसे की जा सकती है। ज्ञान विहीन आचार का मूल्य कम हो सकता है। ज्ञान हो और फिर उसका आचरण अच्छा हो तो उसका विशेष महत्त्व होता है। ज्ञानपूर्वक आचार का पालन और ज्ञानपूर्वक होने वाली साधना ज्यादा लाभदायी हो सकती है। साधना के लिए धर्म की आराधना आवश्यक है। धर्म के दो प्रकार बताए गए हैं-संवर और निर्जरा।

‘सम्बोधि’ में बताया गया है कि संवर धर्म से शत् और अशत् संस्कार सर्वथा निरुद्ध हो जाते हैं। यहां संस्कार शब्द का प्रयोग कर्म के अर्थ में प्रयोग किया गया है और शत्-अशत् का अर्थ शुभ और अशुभ के अर्थ के लिए किया गया है। संवर से शुभ और अशुभ कर्म आने से निरुद्ध हो जाता है। मन, वचन और कार्य की प्रवृत्ति योग कहलाती है। यदि आदमी के भीतर संवर की साधना उत्कृष्ट है तो शुभ योग भी रूक जाता है। शुभ योग की विद्यमानता में मोक्ष का प्राप्त होना भी संभव नहीं होता। क्योंकि जब तक आत्मा के भीतर शुभ या अशुभ योग रहता है, आत्मा मोक्ष की ओर गति नहीं कर सकती। शुभ योग रूपी आश्रव आदमी के साथ तेरहवें गुणस्थान तक रहने वाला है। उसके जाने के बाद ही मुक्ति की बात की जा सकती है। संवर की साधना शुभ या अशुभ कर्मों को आत्मा से चिपकने से रोकता है। आदमी यदि शुभ कार्य भी करता है तो उसे पुण्य का लाभ प्राप्त होता है। पुण्य भी जब आत्मा में नहीं रहेंगे तो मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है। सामायिक भी एक प्रकार से संवर की साधना है। सामायिक न शुभ योग है और न ही अशुभ योग है। आदमी के भीतर संवर और निर्जरा तत्त्व है तो आदमी के कर्म झड़ते हैं। साधु के तो प्रत्येक कार्य के साथ निर्जरा हो सकती है। यदि साधु जागरूक है तो उसके प्रत्येक कार्य से निर्जरा हो सकती है। आदमी को सामायिक के दौरान अनावश्यक सांसारिक बातों में नहीं लगाना चाहिए। सामायिक के दौरान व्यापारिक चिन्तन से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचार का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। उक्त जीवनोपयोगी पावन पाथेय जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें आचार्य, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, मानवता के मसीहा, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रदान की।


आचार्यश्री ने आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के जीवनी पर स्वरचित ग्रन्थ ‘महात्मा महाप्रज्ञ’ का सरसशैली में वाचन कर उनके जीवन के विभिन्न प्रसंगों को रोचक ढंग से व्याख्यायित किया। उसके माध्यम से आचार्यश्री ने बताया कि आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के बाल मन में एक दोहे का अलग अर्थ बनना भी उनके जीवन के विकास का निमित्त बन गया। महातपस्वी आचार्यश्री को तपस्या रूपी भेंट अर्पित करने में मानों बेंगलुरुवासियों में होड़-सी मची हुई है। बुधवर को अनेकानेक तपस्वियों ने अपनी-अपनी धारणानुसार तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया। इन तपस्वियों में श्रीमती मंजू बोहरा तथा श्रीमती बिन्दु रायसोनी ने 31 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान कर अपने आराध्य के श्रीचरणों में तपस्यारूपी सुमन अर्पित की।

अणुव्रत समिति के व्यसन मुक्ति अभियान का शुभारंभ

सूरत -अणुव्रत समिति उधना की ओर से उधना तीनरास्ता  पर व्यसन मुक्ति अभियान के अंतर्गत अणुव्रतों का यह संदेश व्यसन मुक्त तो सारा देश की शुरुआत ऑटो रिक्शा के पीछे बैनर लगाकर की गई सभी ऑटो चालक को व्यसन नहीं करने की शपथ दिलाई गई इस कार्यक्रम में अणुव्रत समिति उधना के अध्यक्ष नेमीचंद  कावड़िया मंत्री विजय कांत खटेड सहित कई सदस्य उपस्थित रहे

असफल होने पर आत्महत्या का विचार कायरता है - मुनि पुलक सागर जी

सूरत -चंद्रप्रभु जैन मंदिर पर्वत पाटिया पर चल रहे 22दिवसीय ज्ञान गंगा महोत्सव के 19 वे दिन को मुनि पुलक सागर महाराज ने कहा कि जन्म जन्मांतर के गुणों के बाद मनुष्य योनि मिलती है मानव शरीर के लिए देवता भी तरसते हैं जीवन यापन तो सभी जीव कर लेते हैं परंतु मनुष्य सत्कर्म परोपकार करते हुए भगवत प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है महाराज ने कहा कि ऐसी सुंदर मानव संरचना को कुछ लोग थोड़ी से असफलताओं के बाद जिंदगी को ही दांव पर लगा देते हैं सुख दुख संयम पूर्वक रहने का नाम जिंदगी है जीवन में असफल होने पर आत्महत्या का विचार कायरता है महाराज ने कहा कि आत्महत्या का भाव मन में आना भाव हिंसा होती है आगम व जिनवाणी के अनुसार ऐसे भाव हिंसा वालों को नरक गति प्राप्त होता है बहुत पुण्य का फल होता है तब सन्यास मिलता है दान व सन्यास का भाव आए तो तुरंत कर लेना लेकिन अशुभ विचार मन में आए तो उसे टालते जाना सन्यास वीरों का मार्ग है कन्यादान तो सभी करते हैं परंतु जगत कल्याण के लिए बेटों का दान तो विरले कोई माँ किया करती है सदियों का पुण्य होता है तब जाकर लोगों के बीच कोई जोगी बैठता है भौतिकता वादी जीवन नहीं दे सकती तो भौतिक असफलता जीवन ले भी नहीं सकती महाराज ने कहा कि यह दुर्भाग्य है कि कुछ कम अंक आने पर किशोर एवं कर्ज होने पर हमारे देश के किसान आत्महत्या कर लेते हैं जिंदगी भर मौत को जीतने का प्रयास करना चाहिए उन्होंने कहा कि अमेरिका के अब्राहम लिंकन 21 वर्ष की उम्र से चुनाव हारते रहे और 50 वर्ष की उम्र में अमेरिका के राष्ट्रपति बने समिति के मीडिया प्रभारी अशोक बड़जात्या ने बताया कि महाराज ने कहा कि जिंदगी को आनंद पूर्वक जीना चाहिए

Thursday, 15 August 2019

भौतिक, आर्थिक, शैक्षिकता के साथ नैतिक और आध्यात्मिक विकास भी करे भारत -राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी

राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रदान की राष्ट्रवासियों को पावन प्रतिबोध 
भारत के सर्वांगीण विकास ही दिखाई राह, इन्द्रियों की परतंत्रता से मुक्ति का दिखाया मार्ग
संस्कृत दिवस पर श्रीमुख से प्रस्फुटित हुई देववाणी संस्कृत, आह्लादित हो उठे श्रद्धालु
आचार्य महाप्रज्ञ हाईस्कूल के विद्यार्थियों ने दी अपनी प्रस्तुति, प्राप्त किया आशीष 

कुम्बलगोडु 15.08.2019  बेंगलुरु (कर्नाटक): गुरुवार अर्थात् श्रावण शुक्ला पूर्णिमा का दिन। भारत के लिए दोहरे त्योहार का दिन। एक ओर जहां पूरे देश में आजादी के जश्न में सराबोर तो दूसरी ओर पूरे भारत में भाई-बहनों के अटूट प्रेम का सूचक पर्व रक्षाबन्धन की धूम ऐसे में जन-जन को सत्पथ दिखाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को ‘सम्बोधि’ ग्रन्थाधारित अपने पावन प्रवचन से मंगल संदेश प्रदान करते हुए कहा कि आदमी पंचेन्द्रिय प्राणी होता है और पशु भी पंचेन्द्रिय होता है। देव भी पंचेन्द्रिय होते हैं और नारकीय जीव भी पंचेन्द्रिय होते हैं।
‘सम्बोधि’ में बताया गया कि आदमी के पांच इन्द्रियां होती हैं, जिन्हें ज्ञानेन्द्रियां भी कहा कहा जाता है। एक आदमी अपने इन्द्रियों के वशीभूत हो जाता है और दूसरा इन्द्रियों को अपने वश में कर लेता है। इन्द्रियों को जितने वाला जितेन्द्रिय बन जाता है और जो इन्द्रियों के वशीभूत होता है, उसे वह इन्द्रियां कहां से कहां ले जाती हैं और क्या-क्या नहीं करवाती हैं। आदमी इन्द्रियों के वशीभूत होकर कभी अच्छा खाने के लिए दौड़ लगाता है तो कभी अन्य सुखों की चाह में अन्यत्र भटकता है। इन्द्रियों के सुख की चाह में आदमी दुःख को प्राप्त होता है। इस कारण आदमी न चाहते हुए भी दुःख के गर्त में गिरता चला जाता है। उदाहरण के तौर पर देखें तो आदमी मनोज्ञ भोजन के लिए कहां से कहां चला जाता है और जिह्वा के स्वाद के तृप्ति के लिए कभी आवश्यकता से अधिक खा लिया तो फिर तकलीफ भी पा जाता है। आदमी को अपनी इन्द्रियों का परतंत्र नहीं होना चाहिए, आदमी को इन्द्रियों को वश में करने और स्वयं स्वतंत्र रहने का प्रयास करना चाहिए।
आज 15 अगस्त का दिन भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है। आज भारत स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। भारत ने आज के दिन राष्ट्र की दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्त की थी, इस बात का भी महत्त्व है। आज के दिन आदमी को यह चिंतन करना चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर अनैतिकता और नशा आदि की परतंत्रता में तो जीवन नहीं जी रहा। जिस प्रकार भारत की आजादी के लिए कितने संघर्ष करने पड़े थे, उसी प्रकार आदमी को और भारत देश को भी अनैतिकता से आजादी पाने का प्रयत्न करना चाहिए। भारत के पास आध्यात्मिक संपदा भी है तो संतों की संपदा भी है। भारत के ग्रन्थों की भी संपदा है। भारत के लिए भौतिक विकास, आर्थिक विकास, शैक्षिक विकास आवश्यक है तो उसके साथ-साथ नैतिकता का विकास और आध्यात्मिकता का भी विकास हो जाए तो भारत का सर्वांगीण विकास संभव हो सकता है। आज के दिन राष्ट्र का दिन है वहीं आज रक्षाबन्धन भी है। भाई-बहनों के रिश्तों को मजबूती प्रदान करने वाला है। एक-दूसरे की रक्षा की भी बात हो सकती है। इसके साथ ही आदमी को अपनी आत्मा की रक्षा का भी प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने आज के दिन को संस्कृत दिवस के रूप में बताते हुए देववाणी कही जाने वाली संस्कृत भाषा में मंगल पाथेय प्रारम्भ किया तो यह सौभाग्य प्राप्त कर मानों जन-जन का मन पुलकित और आनंद से भर गया। आचार्यश्री संस्कृत भाषा में पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि संस्कृत भाषा बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस भाषा में कितने-कितने महत्त्वपूर्ण धर्मग्रन्थ रचित हैं। बालमुनियों और साध्वियों को संस्कृत भाषा को सीखने का प्रयास करना चाहिए। संस्कृत भाषा के ग्रन्थों को पढ़ने, उन्हें कंठस्थ करने तथा उनका विवेचन करने का प्रयास होना चाहिए। प्राचीन समय में संस्कृत का ज्ञान आवश्यक होता था। संस्कृत को पढ़ने और इसे सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार संस्कृत भाषा की रक्षा करने की प्रेरणा संस्कृत दिवस से प्राप्त की जा सकती है।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के पश्चात् आचार्य महाप्रज्ञ हाईस्कूल के विद्यार्थियों द्वारा विभिन्न प्रस्तुतियां दी गईं। इनमें छात्राओं ने आचार्यश्री महाप्रज्ञजी पर रचित गीत का संगान किया। छात्रा गगना और सुषमा द्वारा अभिभाषण की प्रस्तुति हुई। छात्रों ने अणुव्रत गीत का भी संगान किया। छात्रा प्रणम्य डी. जैन ने संस्कृत भाषा में अपनी अभिव्यक्ति दी। छात्रों द्वारा योग के विभिन्न आयामों की प्रस्तुति दी गई। बच्चों ने जीवन-विज्ञान के संदर्भ में परिसंवाद प्रस्तुत किया। अणुव्रत के संदर्भ में भी विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी। इन कार्यक्रमों का संचालन छात्रा सुषमा और तेजस्विनी द्वारा किया गया। आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को पावन पाथेय प्रदान किया। विद्यालय के चेयरमेन श्री मनोहर भारती में अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री महाश्रमण चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मूलचंद नाहर ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। नित्य की भांति आज भी अनेकानेक तपस्याओं का प्रत्याख्यान हुआ।

Sunday, 28 July 2019

तपोमूर्ति मुनि कमलकुमारजी के सानिध्य में अणुव्रत नैतिक गीत गायन प्रतियोगिता का आयोजन


सूरत - ( अलका सांखला) अणुव्रत नैतिक गीत गायन राष्ट्रीय प्रतियोगिता तपोमूर्ति मुनि कमलकुमारजी के सानिध्य में शनिवार दिनांक 27-7 -2019 को तेरापंथ भवन सिटीलाइट में सुबह 10:00 बजे से *अणुव्रत नैतिक गीत गायन प्रतियोगिता का आयोजन  किया गया
मुनिश्री ने बच्चों के प्रोत्साहन के लिए गीतिका व्दारा अच्छेबच्चों के गुण बताये, गीत भाव से सभी भाव विभोर हुये!उन्हें अच्छे परफॉर्मेंस के लिए आशीर्वाद दिया  नैतिकता से जीवन जीने तथा अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा  भी दी मुनि श्री के आशीर्वचन से प्रतियोगिता का प्रारंभ किया गया ।
प्रतियोगिता में  चयनित स्कूल का समूह 10 ,11 और 12 अक्टूबर 2019 को  आचार्य श्री  महाश्रमण जी के सानिध्य में  होने वाले  राष्ट्रीय स्तर प्रतियोगिता में  बेंगलुरु जाएंगे  । 
विशेष बात यह है  किस संपूर्ण प्रतियोगिता  निशुल्क है  और इसके सारे खर्चे का वहन  अणुव्रत न्यास  दिल्ली द्वारा किया जाता है  प्रत्येक  प्रतिभागी को  राष्ट्रीय स्तर के  प्रमाण पत्र दिए जाते हैं सूरत शहर  की १५विद्यालयों से २५० प्रतिभागियों ने भाग लिया जी डी गोयनका लोकभारती एसडी जैन एलपी सवानी दिव्यांग स्कूल जैसे जाने-माने सभी स्कूल शामिल हुए 


अणुव्रत जीवन विज्ञान की गुजरात प्रभारी  श्रीमती अलका जी सांखला ने प्रतिभागियों को  कार्यक्रम के नियमों की जानकारी दी  तथा  संपूर्ण कार्यक्रम की देखरेख  सूरत संयोजिका  रेखा जी  ढालावत द्वारा की गई सूरत अणुव्रत समिति के संयोजक श्री गौतम जी गादिया ने सभी अतिथि गणों का  स्वागत किया  मधु देरासरिया ने कार्यक्रम का संचालन  सुचारू रूप से किया  मधु नाहटा ने बच्चों को कविता पाठ  द्वारा प्रेरित किया श्री गौतम जी गादिया ने  सभी अतिथि गणों का व विद्यार्थियों का स्वागत किया।
 श्रीमती पारुल बहन गिरीश भाई लॉर्ड और श्रीमती शिल्पा संजय भाई पाववाला, पियनका भुतान और खटेडकार्यक्रम में जज के रूप में उपस्थित रहे ।
एकल और सामूहिक दोनों प्रकार के गायन समूहों में बच्चों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और एक से बढ़कर एक सुंदर गीत गाये बच्चों की प्रस्तुति देखने योग्य थी। निृ्णायक को निर्णय देने में कठिनाई हुई, ऐसी एक से बढ़कर एक प्रस्तुति के Result नीचे दिये हैं।
एकल गायन -कनिष्ठवर्ग
प्रथम - जी. डी. गोइनका -नित्या गुप्ता
द्वितीय- पी.पी. सवानी - श्रावणी
तृतीय- वनिता विश्राम - चरमि कांट्रैक्टर
एकल गायन - वरिष्ठ वर्ग
प्रथम - पी.पी.सवानी - ऐश्वर्या लाला
द्वितीय- शारदा यतन- व्रतिपटेल
तृतीय - एस.डी. जैन - ओम् पाण्डेय
समूह गायन - कनिष्ठ वर्ग
प्रथम - पी. पी. सवानी
द्वितीय - एल. पी.सवानी
तृतीय - एस.डी.जैन
समूह गायन - वरिष्ठ वर्ग
प्रथम - शारदा यतन इंग्लिश
द्वितीय - शरदायतन गुजराती
तृतीय - अन्धजन शाला