Monday, 1 July 2019

प्रेक्षाध्यान बने दिनचर्या का हिस्सा: महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

रहुतनहल्ली, बेंगलुरु (कर्नाटक): प्रेक्षाध्यान के प्रणेता, प्रज्ञापुरुष, युगप्रधान आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की जन्म शताब्दी समारोह के दूसरे दिन भी अध्यात्म जगत के महापुरोधा के श्रीचरणों में चतुर्विध धर्मसंघ द्वारा श्रद्धासुमनों का अर्पण जारी रहा। इसके कारण पूरा वातावरण मानों इन भाव सुमनों से भावित हुआ-सी दिखाई दे रहा था। बेंगलुरु का जितना शांत और सुहाना मौसम है, मानों उसी अनुकूल आत्मीय शांति की प्रेरणा प्रदान करने वाले महात्मा महाप्रज्ञ की जन्म शताब्दी मानों जन-जन के जीवन सुहाना बनाने वाली बन रही है। 

सोमवार को प्रातः नौ बजे से ही मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का समायोजन हुआ। इस कारण निर्धारित समय पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ‘भिक्षु महाप्रज्ञ समवसरण’ में पधारे। मंच पर विराजमान आचार्यश्री के एक ओर संतों की कतार दो दूसरी साध्वियों की पंक्तियां थी। सामने की ओर समणीवृंदों की उपस्थिति तो आचार्यश्री के अभिमुख श्रद्धालुओं की उपस्थिति थी। जन्म शताब्दी समारोह के दूसरे दिन का शुभारम्भ शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ। उसके बाद आरम्भ हुए भाव सुमनों के समर्पण के क्रम में मुनि अक्षयप्रकाशजी, मुनि कोमलकुमारजी, मुनि मननकुमारजी, मुनि नयकुमारजी, मुनि रजनीशकुमारजी, मुनि योगेशकुमारजी, समण सिद्धप्रज्ञजी, समणी कुसुमप्रज्ञाजी, साध्वी कमनीयप्रभाजी व साध्वी विमलप्रज्ञाजी ने आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के प्रति अपने श्रद्धासिक्त भावसुमन अर्पित किए। मुनि चैतन्यकुमारजी ने गीत के माध्यम से अपनी प्रणति अर्पित की। मुमुक्षु बहनों ने भी गीत का संगान कर अपने दसमाधिशास्ता का स्मरण किया। 

युगप्रधान आचार्य के पट्टधर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि अध्यात्म साधना में बताया गया है कि साधु को अपनी देह के प्रति भी ममत्व का भाव नहीं रखना चाहिए। हांलाकि यह बहुत ऊंची और मुश्किल बात है। आदमी के भीतर आत्मा और शरीर के प्रति भेद की चेतना का विकास हो जाए तो शरीर के प्रति आसक्ति कम हो सकती है। 

आचार्य महाप्रज्ञजी द्वारा दिए गए प्रेक्षाध्यान के माध्यम से आदमी मोक्ष की ओर आगे बढ़ सकता है। सोते, उठते, बैठते, चलते अथवा लेटे हुए भी प्रेक्षाध्यान की साधना की जा सकती है। जब केाई को सोए तो पहले वह कायोत्सर्ग की स्थिति में सोए तो प्रेक्षाध्यान का क्रम बन सकता है। इस प्रकार प्रत्येक कार्य में सहज साधना की जा सकती है और ऐसी साधना आवश्यक भी होती है। भाव क्रिया अच्छी हो तो जीवन में शांति रह सकती है। किसी के प्रति वैर, विरोध की भावना नहीं, बल्कि सबके प्रति मैत्री के भाव का विकास हो तो जीवन कितना शांतिमय बन सकता है। आहार में संयम की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। यह मीताहार की साधना हो गई। आदमी को अपनी वाणी का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। मीत भाषण का प्रयोग जीवन में करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन के हर क्षण के साथ प्रेक्षाध्यान को जोड़कर अपने दिनचर्या और जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। इस दौरान हाजरी वाचन का भी क्रम रहा। आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों को प्रतिक्रमण और अर्हत वन्दना को अच्छे ढंग से करने की प्रेरणा प्रदान की। इसके उपरान्त साध्वी रचनाश्रीजी व साध्वी आस्थाश्रीजी ने कविता पाठ किया। साध्वी मंजूरेखाजी व साध्वी मंजूरेखाजी व साध्वी श्वेतप्रभाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वी विद्यावतीजी की सहवर्ती साध्वियों ने परि-संवाद के माध्यम से अपने भावसुमन अर्पित किए। श्रीमती संगीता तातेड़ ने कविता पाठ किया। प्रेक्षा फाउण्डेशन की ओर से किशोर मण्डल व कन्यामण्डल ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। प्रेक्षा संगीत सुधा के सदस्यों ने गीत का संगान किया। श्री गौतम कोठारी आदि ने ज्ञानाराधना पुस्तक को श्रीचरणों में लोकार्पित किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया

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