Wednesday, 5 September 2018

शुद्ध राजनीति में समाविष्ट हो धर्मनीति ओर न्यायनीति - शांतिदूत आचार्य महाश्रमण

शुद्ध राजनीति में समाविष्ट हो धर्मनीति और न्यायनीति: शांतिदूत महाश्रमण

लोकतंत्र और राजतंत्र को आचार्यश्री ने किया विवेचित, मुखिया की कार्यप्रणाली हो धर्मयुक्त

अध्यात्म जगत में तीर्थंकर सर्वोच्च तो छह खंडों के अधिपति होते हैं चक्रवर्ती

‘ठाणं’ आगम के द्वारा शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा अविरल प्रवाहित है ज्ञानगंगा

05.09.2018 माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु): दुनिया में राजनीति एक आवश्यक तत्त्व होता है। चाहे वह भले ही किसी प्रणाली से हो। एक प्रणाली लोकतांत्रिक तो दूसरी प्रणाली राजतांत्रिक होती है। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए मतदान की व्यवस्था है। मानों इसमें स्वयं जनता द्वारा चुना हुआ व्यक्ति प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति होता है। इसके माध्यम से एक साधारण आदमी भी देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन सकता है। राजतंत्र में एक राजा का शासन चलता है, वह राजनीति का एक माध्यम होता है। जहां वंशवाद भी चलता चलता है, लेकिन कभी-कभी इसमें भी एक साधारण आदमी को भी राजा बनने का अवसर मिल जाता है। दोनों का मूल उद्देश्य प्रजा को सुखी बनाने के लिए और कानून व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना होता है। राजनीति में भी धर्म रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी-कभी कोई राजनेता अथवा राजनैतिक व्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण पापाचार, निष्ठुरता, निर्दयता, हिंसा, परिग्रह व काम-भोगों के प्रति आसक्ति में चला जाता है, जिसके कारण राजनीति भी दूषित हो जाती है।

जो राजा अथवा राजनेता या मुखिया अपनी प्रजा को आसक्ति में आकर कष्ट देता है, पापाचार करता है, हिंसा करता है, काम-भोग और परिग्रह में लिप्त हो जाता है, वैसे लोग मरकर सातवें नरक तक भी जा सकते हैं। राजनीति में भी धर्म कैसे, न्यायपूर्ण व्यवस्था कैसे चले इसपर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। राजनीति सेवा एक माध्यम है। राजनीति में धर्म रखने का प्रयास हो और न्यायपूर्ण सुन्दर सुव्यवस्थित चले तो प्रजा सुखी बन सकती है और राजनीति भी सार्थक हो सकती है। उक्त ज्ञान की बातें बुधवर को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को बताईं।
ठाणं आगमाधारित अपने पावन प्रवचन में आचार्यश्री ने बताया कि दो चक्रवर्ती ऐसे भी हुए जिन्होंने काम-भोगों का त्याग नहीं किया और वे मरकर सातवें नरक तक चले गए। भौतिक दुनिया में चक्रवर्ती से कोई बड़ा नहीं होता और आध्यात्म जगत में तीर्थंकर से बड़ा कोई नहीं होता। चक्रवर्ती सुभूम और ब्रह्मदत्त काम-भोगों के कारण सातवें नरक चले गए। इस प्रकार आचार्यश्री ने आगम में वर्णित दो चक्रवर्ती के घटना प्रसंग को सुनाने और पावन प्रेरणा प्रदान करते उपरान्त मुनिपत के व्याख्यान से भी लोगों को लाभान्वित कराया।

आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे जैन संघ के अध्यक्ष श्री सज्जन राज शाह ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री से लोगों ने अपनी-अपनी धारणा के अनुसार प्रत्याख्यान भी स्वीकार किया।

                  संप्रसारक
            सूचना एवं प्रसारण विभाग
         जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा

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