Tuesday, 4 September 2018

शरीर रूपी नौका से संसार समुद्र को तरने का हो प्रयास: आचार्यश्री महाश्रमण


शरीर को धर्म और अध्यात्म की साधना में लगाने की दी पावन प्रेरणा - ‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन शृंखला को निरंतर आगे बढ़ा रहे महातपस्वी आचार्य -  आचार्यश्री की पावन प्रेरणा से श्रद्धालु हो रहे निहाल

                                                     आचार्य श्री महाश्रमण जी 

 माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु): जन-जन के मानस को पावन बनाने वाले, सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के रूप में जनकल्याणकारी उद्देश्यों के साथ भारत के साथ-साथ विदेशी धरती को भी अपने चरणरज से पवित्र करने वाले, अनेक कीर्तिमानों की स्थापना करने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी इस विशाल और जनकल्याणकारी ‘अहिंसा यात्रा’ के साथ दक्षिण की धरा पर अपना प्रथम चतुर्मास चेन्नई महानगर के माधावरम में कर रहे हैं।
आचार्यश्री के शुभागमन के बाद से माधावरम एक तीर्थस्थल बन गया है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का मानों पूरे समय तांता सा लगा हुआ है। एयरपोर्ट हो, रेलवे स्टेशन हो अथवा बस स्टैंड या टैक्सी स्टैंड हर जगह से आने वाले श्रद्धालुओं का एक ही लक्ष्य और एक ही ठिकाना होता है राष्ट्रसंत महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पहुंचना। वहीं तमिलनाडु और आसपास के राज्यों में रहने वाले श्रद्धालुओं के लिए मानों सुनहारा अवसर बना हुआ है। वे अपने कार्य और व्यापार आदि से जैसे ही उन्हें थोड़े समय का अवसर मिलता है, बस निकल पड़ते हैं लोग अपने आराध्य की दर्शन-उपासना के लिए। शनिवार और रविवार के दिन तो मानों लगता है जैसे जन सैलाब उमड़ पड़ता है। आचार्यश्री भी श्रद्धालुओं को अध्यात्म और धर्म की पावन प्रेरणा देते हुए अपने मंगल आशीष प्रदान करते हैं तो श्रद्धालु निहाल हो उठते हैं।
ऐसे मानवता के परम उपकारी राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्मास प्रवास स्थल परिसर में बने भव्य ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए अपने ‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन शृंखला के क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जैन वाङ्मय में भूगोल और खगोल की बात भी प्राप्त होती है। इसमें ढाई द्वीप को जम्बूद्वीप कहा जाता है, जिसमें मनुष्य रहते हैं।
यह संसार एक समुद्र है, शरीर नौका और जीव नाविक है। महर्षि लोग शरीर रूपी नौका के माध्यम से संसार रूपी समुद्र को तर जाते हैं। आदमी के जीवन में ज्ञान की गहराई और आचार की उच्चता हो तो आदमी इस संसार समुद्र को तर सकता है। आदमी को इस शरीर के माध्यम से धर्म और अध्यात्म की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने शरीर का धर्म और साधना में लगाने का प्रयास करे और समय रहते धर्म कर ले तो संसार समुद्र को तरने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
मुख्य मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने मुनिपत के व्याख्यान क्रम को भी आगे बढ़ाया। इसके उपरान्त आचार्यश्री के समक्ष अपने तपस्वियों ने अपनी-अपनी धारणा के अनुसार अपनी-अपनी तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया।
संप्रसारक - सूचना एवं प्रसारण विभाग
जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा

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