Tuesday, 7 August 2018

आचार्य श्री महाश्रमण जी के सानिध्य में पंहुचे संत कृपारामजी व संत राजाराम जी

संयम के साधक ने संयम को किया व्याख्यायित

‘ठाणं’ आगमाधारित पावन प्रवचन से श्रद्धालुओं को प्राप्त हो रहा आध्यात्मिक लाभ

-राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमण की मंगल सन्निधि में पहुंचे संत कृपारामजी व संत राजारामजी

संत कृपानंदजी ने कहा परकल्याण हेतु आचार्यश्री की अहिंसा यात्रा दाण्डी यात्रा से कई गुनी बड़ी

07.08.2018 माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु): तमिलनाडु राज्य की राजधानी चेन्नई महानगर के माधावरम में अपना चतुर्मासकाल व्यतित कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत, मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में चेन्नईवासियों को अपने श्रीमुख से ‘ठाणं’ आगमाधारित ज्ञानामृत का पान करा रहे हैं, जो केवल चेन्नईवासियों का ही नहीं, अपितु मानवजाति का कल्याण करने वाला है। यहीं कारण है कि आचार्यश्री के अमृतवचनों का श्रवण करने के लिए नियमित रूप से श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ रहा है।

मंगलवार को आचार्यश्री जब ‘महाश्रमण समवसरण’ में पधारे और मंचासीन हुए तो आचार्यश्री के निकट आज दो संत श्री कृपारामजी तथा उनके गुरु संत राजारामजी भी उपस्थित थे। संत द्वय आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचते ही सादर वंदन किया और आचार्यश्री के सन्निकट विराजे। संत राजारामजी ने आचार्यश्री की महिमा का गुणगान करते हुए लोगों को संबोधित किया। इसके उपरान्त संत कृपानंदजी ने आचार्यश्री की कोलकाता से चेन्नई की प्रलम्ब यात्रा का वर्णन करते हुए कहा कि मुझे जहां तक ज्ञात हुआ कि आचार्यश्री की यह प्रलम्ब यात्रा महात्मा गांधी की दाण्डी से आठ गुना ज्यादा बड़ी है और ऐसे न जाने कितनी-कितनी बड़ी यात्राएं आचार्यश्री ने मानव कल्याण के लिए की हैं। आचार्यश्री महाश्रमणजी की परकल्याण की भावना से की जाने वाली यह अहिंसा यात्रा अपने आप में अद्वितीय है। आप तो स्वयं का सुख त्याग कर दूसरों को सुख प्रदान करने वाले हैं। चेन्नईवासियों को आचार्यश्री से पावन प्रेरणा लेकर अपने जीवन को सुखमय बनाने का यह अवसर छोड़ना नहीं चाहिए। आचार्यश्री के दर्शन और सान्निध्य मिला, उसे मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता। आपके चरणों में मैं पहले भी बच्चा था, आज भी हूं और आगे भी बच्चा रहना चाहूंगा। आपकी कृपा सदैव प्राप्त होती रहे।

इसके उपरान्त तेरापंथ धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने भी उपस्थित श्रद्धालुओं को उत्प्रेरित किया। तत्पश्चात् आचार्यश्री ने अपने श्रीमुख से ‘ठाणं’ आगम की अमृतवाणी को प्रवाहित करते हुए कहा कि संयम दो प्रकार के होते हैं-सराग संयम और वीतराग संयम। जैन तत्त्व विद्या के अनुसार मोक्ष जाने की 14 सीढ़ियों का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार प्रथम पांच सीढ़ियों तक तो गृहस्थ भी जा सकता है, किन्तु शेष आगे की सीढ़ियों पर गति करने के लिए साधु बनना ही पड़ता है। छठें गुणस्थान से 10वें गुणस्थान तक संयम का पालन करने वाला साधु सराग संयम का पालन करता है और ग्यारहवें गुणस्थान से चैदहवें गुणस्थान तक का संयम पालन करने वाला साधु वीतरागता को प्राप्त कर सकता है। संयम की साधना के द्वारा ही आदमी मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। इसलिए साधु ही नहीं आदमी को भी अपने जीवन में संयम का विकास करने का प्रयास करना चाहिए और कषायों को कमजोर अथवा प्रतनू बनाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने दोनों संतों से मिलन को अच्छा बताया और उन्हें अपने साथ-साथ जनता का भी कल्याण करने की प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने मूल मंगल प्रवचन के पश्चात् ‘मुनि मुनिपत’ के व्याख्यान क्रम को भी आगे बढ़ाया और उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने जीवन में संयम की साधना करने और अपने गुस्से आदि अन्य कषायों को कमजोर अथवा क्षीण करने का प्रयास करना चाहिए।

                  🙏🏻संप्रसारक🙏🏻
            सूचना एवं प्रसारण विभाग
         जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा

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