Monday, 20 August 2018

मोह-मूर्छा का हटे आवरण, तो आत्मा की निर्मलता हो उजागर: महातपस्वी महाश्रमण


आगमवाणी से अपने जीवन को भावित कर रहे चेन्नीवासी 
‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन में आचार्यश्री ने मूर्छा को किया विवेचित



20.08.2018 माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु): दक्षिण भारत की धरती को पहली बार अपने चरणरज से पावन बनाने, जन-जन में मानवीय मूल्यों की स्थापना करने, खोती नैतिकता को लोगों के दिलों में पुनः स्थापित करने और लोगों को सन्मार्ग पर लाने जैसे जन कल्याणकारी संकल्पों के साथ अपनी विशाल धवल सेना के साथ गतिमान हुए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें देदीप्यमान महासूर्य, अहिंसा यात्रा प्रणेता, अखण्ड परिव्राजक शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के माधावरम में अपना चतुर्मासकाल सुसम्पन्न कर रहे हैं। जनकल्याणकारी, मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी नियमित रूप से आगमवाणी के माध्यम से लोगों को पावन पाथेय प्रदान कर रहे हैं।
दक्षिण की धरा पर प्रथम चतुर्मास करने वाले आचार्यश्री की आगमवाणी समूचे दक्षिण भारत को मानों पावनता प्रदान कर रही है। इसका प्रभाव इस माध्यम से जाना जा सकता है कि आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के प्रश्चात् अनेकानेक लोग विभिन्न प्रकार की तपस्याओं का प्रत्याख्यान कर रहे हैं और अपनी आत्मा के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के दौरान भी सैंकड़ों-सैंकड़ों लोग सामायिक के द्वारा कर्मों का निर्जरा करने का प्रयास करते हैं। ऐसा लगता है मानों समूचा वातावरण ही भक्तिमय बना हुआ है।
सोमवार को प्रातः की मंगल बेला में ‘महाश्रमण समवसरण में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपने श्रीमुख से ‘ठाणं’ आगम में वर्णित मोह-मूर्छा को विवेचित करते हुए कहा कि मूर्छा दो प्रकार की होती है-पहला प्रेयस प्रत्यया और द्वेष प्रत्यया। मूर्छा एक मोह का आवरण है। जिस प्रकार सूर्य बादलों से आवृत हो जाता है उसकी तेजस्विता मंद पड़ जाती है अथवा पूरी तरह ढंक जाता है उसी प्रकार मूर्छा से आवृत चेतना की तेजस्विता-निर्मलता आवृत हो जाती है। मूर्छा को मोह भी कहा गया है। मूर्छा राग और द्वेष के कारण पैदा होती है।
कई बार आदमी को जो पसंद नहीं होता, किन्तु वह उसके अनुकूल तो आदमी को उसपर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। जैसे कोई दवा कड़वी होती है, किन्तु वह उसके स्वास्थ्य के अनुकूल होती है तो आदमी को उसे ध्यान देकर लेने का प्रयास करना चाहिए। कई बार कोई वस्तु मनोज्ञ होती है और वह स्वास्थ्य आदि की दृष्टि से सही न तो उसके उपयोग से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को राग-द्वेष की भावना से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को मनोज्ञ पदार्थ को देखकर राग भाव तथा अमनोज्ञ को देखकर आक्रोश में जाने से बचने का प्रयास करना चाहिए। किसी ने अगर कोई गलती बताई है तो उसे सुधार करने का प्रयास करना चाहिए। भोजन के समय भी अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समता भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। राग का भाव तो साधु को भी उसके साधना पथ से विचलित करने वाला हो सकता है। इसलिए साधु को राग भाव से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को मूर्छा के भावों को प्रतनु बनाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आगमवाणी के मंगल प्रवचन के पश्चात् ‘मुनि मुनिपत के व्याख्यान’ को भी रोचक ढंग से श्रद्धालुओं को श्रवण कराया।
उसके उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अनेकानेक लोगों ने अपनी-अपनी तपस्या का प्रत्याख्यान किया। अखिल भारतीय महिला मंडल की अध्यक्षा श्रीमती कुमुद कच्छारा ने सन् 2018 के लिए श्राविका गौरव का सम्मान श्रीमती रजनी दूगड़ को देने की घोषणा की। महामंत्री श्रीमती नीलम सेठिया ने प्रशस्ति पत्र का वाचन किया। तत्पश्चात् अखिल भारतीय महिला मंडल की अध्यक्षा सहित अन्य पदाधिकारियों ने श्रीमती रजनी दूगड़ को आचार्यश्री के समक्ष सम्मान समर्पित किया। श्रीमती रजनी दूगड़ तथा श्रीमती संजू दूगड़ ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तत्पश्चात् साध्वीप्रमुखाजी तथा आचार्यश्री ने श्राविका गौरव का सम्मान प्राप्त करने वाली श्रीमती रजनी दूगड़ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए उन्हें अपने जीवन में समता भाव रखने और अपने आत्मा की कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का पावन आशीष प्रदान किया।

संप्रसारक
सूचना एवं प्रसारण विभाग
जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा

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