पद की प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित करने वाला ही महान होता है .... मुनि श्री भूपेंद्र कुमार जी चिंतन लेखमाला 【भाग - 344】 अशांति का मूल कारण है, व्यक्ति के मन में जागृत इच्छाएं। जब तक इच्छाएं, कल्पनायें पूरी नहीं होती है, तब तक व्यक्ति उसके पीछे दौड़ता रहता है। भागता रहता है। मन में अशांति के बीजो का बीजारोपण करता रहता है। उसका एकमात्र ध्येय होता है, मुझे पद, सम्मान, सत्ता मिल जाये। इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। किन्तु लड़ झगड़ कर लिया गया पद उसके लिए अशांति का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। पद प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है। पद की गरिमा को बनाये रखना बड़ी बात है। यदि पद की प्रतिष्ठा कायम नहीं रख पाते हैं तो वह पद जी का जंजाल बन जाता है। पद पाने के बाद अहंकार का ग्राफ और ऊपर बढ़ जाता है। वह अपने आप को शहंशाह मानने लग जाता है। उसके पश्चात सब जगह वह केवल अपना नाम, यश, ख्याति ही सुनना व देखना पसन्द करता है। महात्मा गांधी ने कहा था "जो मनुष्य जो देखना, सुनना चाहता है, वो वही देखेगा और वही सुनेगा।" आत्मख्याति ही उसका परम लक्ष्य बन जाता है। पद की प्रतिष्ठा की आपूर्ति में वो हजारो कोस दूर चला जाता है। जब यथार्थ के धरातल पर उतर कर आता है, तब तक तो पानी बहुत बह चूका होता है। मूल्य पद का नहीं पद की गरिमा बनाये रखने का है। सुविधाएँ व्यक्ति को सुविधावादी बना देती है। सुविधाओं का उपयोग प्रारम्भ करते ही व्यक्ति की नैसर्गिक शक्तियाँ समाप्त होने लग जाती है। शक्तिहीन व्यक्ति हमेशा ही कायर व कमजोर होता जाता है। अशांति की मूल जड़ तो हमारा मन ही है। यदि मन सच्चाई को स्वीकार करने लग जाये तो अशांति टिक ही नहीं पाती है। सच्चाई के स्वीकरण के बाद सुधार का दौर आरम्भ हो जाता है। सुधार होते ही मन में आनन्द की हिलोरें अपने आप ही तरंगित होने लग जाती है। औरों का अपना तिरस्कार करने से स्वतः छुटकारा मिल जाता है। विचारों में परिवर्तन के दौर के साथ ही जीवन में अपने आप परिवर्तन घटित होने लग जाता है। फिर पद व सत्ता हमारे लिए केवल एक आलम्बन व सहारा बनकर रह जाती है। पद से मेरी प्रतिष्ठा नहीं, मेरे से पद की गरिमा प्रतिष्ठीत होने लग जाती है। नकारात्मक विचारों का स्थान सकारात्मक विचारधारा ग्रहण करने लग जाती है। ततत्पश्चात ऊंच नीच की भेदरेखा स्वतः समाप्त होने लग जाती है। वसुधैव कुटुंबकम की भावना प्रबल से प्रबलतम बनती जाती है। धन सम्पदा का स्थान धर्म सम्पदा ग्रहण कर लेती है। धन अहंकार पैदा करने का साधन है तो धर्म अहंकार विलय का महान सूत्र है। समस्याओं की जड़ मन है तो मन ही मानव को महान बनाने वाला है। आवश्यकता है हमारे चिंतन को सकारात्मक बनाकर साधना के पथ पर आगे बढे। "पद की प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठीत करने वाला ही महान होता है।"
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