Sunday, 24 September 2017

आदर्श कार्यकर्ता की अर्हता है’ आचार्य शुद्धि अनुशासन समर्पण वह कर्तव्यनिष्ठा-साध्वी सोमलता

सूरत- महान तपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या साध्वी श्री सोमलता जी के सानिध्य में जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के तत्वाधान में तेरापंथी सभा उधना द्वारा गुजरात स्तरीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया ।जिसमें महासभा अध्यक्ष किशन लाल डागलिया कोषाध्यक्ष रमेश सुतरिया मुख्य अतिथि सेंट्रल एक्साइज एवं जीएसटी के अतिरिक्त आयुक्त श्री घनश्याम सोनी मुख्य वक्ता श्री दिलीप सरावगी मेवाड़ कॉन्फ्रेंस सुरत के अग्रणीय सवाईलाल पोखरणा उपासक श्रेणी के राष्ट्रीय संयोजक डालिमचंद नवलखा आदि ने उपस्थित रहकर उपयोगी मार्गदर्शन दिया। कार्यशाला में समग्र गुजरात 125 तेरापंथी सभा के लगभग 365 प्रतिनिधि संभागी बने। इस अवसर पर संभागी प्रतिनिधियों एवं विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी श्री सोमलताजी ने कहा कि समाज के लिए कार्यकर्ता की प्रमुख भूमिका रहती है ।कार्य तो सभी कार्यकर्ता करते हैं। लेकिन सभी को आदर्श कार्यकर्ता की उपमा नहीं दी जा सकती।आदर्श कार्यकर्ता के निर्माण के लिए प्रशिक्षण जरूरी होता है ।तेरापंथ धर्मसंघ मर्यादा और अनुशासन की बुनियाद पर अवस्थित धर्म संघ है।कार्यकर्ता में सर्वप्रथम ग्रहण आस्था की आवश्यकता है। आस्था के साथ आंख और पाँख दोनों उन्हें चाहिए ।आज समाज और देश में धर्म के नाम पर जो अंध श्रद्धा और अंधविश्वास का वातावरण दिखाई दे रहा है ।जो भविष्य के लिए घातक है ।आदर्श कार्यकर्ता की अर्हता है’ आचार्य शुद्धि अनुशासन समर्पण वह कर्तव्यनिष्ठा ।आज का मनुष्य बाहर से तो भर रहा है। लेकिन भीतर से खाली होता जा रहा है जहां ऐसा होता है वहां नया विकास और नया प्रकाश अवरुद्ध हो जाता है।साध्वी शंकुन्तलाकुमारीजी ,संचितयशा जी,जागृतप्रभाजी,एवं रक्षितयशाजी ने मंगलगीत का संगान किया एवं श्रद्धा विवेक से कार्य करने की प्रेरणा दी।
महासभा अध्यक्ष किशनलाल डागलिया ने कहा तेरापंथ धर्मसंघ में गुरुदृष्टि की आराधना का सर्वाधिक महत्त्व है।वर्तमान युग मे श्रद्धा व समर्पण के बीच तर्क वितर्क का वायरस घुस गया है। जिसे दूर करने की जरूरत है ।उन्होंने कार्यकर्ताओं को आत्मविश्वास आत्म नियंत्रण और आत्म अनुशासन इन तीन बातों को याद रखने का अनुरोध किया। मुख्य वक्ता दिलीप सरावगी ने कहा कार्यकर्ता में कार्य शक्ति के साथ-साथ अध्यात्मिकता के संस्कार जरूरी है ।मुख्य अतिथि घनश्याम सोनी ने कहा की वर्तमान युग में लोग भौतिक संपदा के पीछे अंधी दौड़ लगा रहे हैं ।राजनेता 75 वर्ष की अवस्था के बाद उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं। ऐसे वातावरण में जैन समाज का एक नई निशा निर्देशित कर रहा है हमें समय के साथ परिवर्तन तो करना चाहिए लेकिन संस्कार रूपी जडो का सिंचन भी करते रहना चाहिए ।सोनी ने कहा “मैं और मेरा”के स्थान पर “हम और हमारा” शब्द का चिंतन करना चाहिए।केंद्रीय संयोजक लक्ष्मीलाल बाफना ने अपने विचार तथा उधना सभाध्यक्ष बसंतीलाल नाहर स्वागत व्यक्तत्व दिया। कार्यक्रम का कुशल संचालन अर्जुन मेड़तवाल ने किया।


No comments:

Post a Comment