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Monday, 24 September 2018

अभातेयुप का 52 वां राष्ट्रीय अधिवेशन चेन्नई मे


अभातेयुप का 52 वां राष्ट्रीय अधिवेशन चेन्नई मे

पेटलावद(नि.प्र.)तेरापंथ धर्मसंघ के 11 वें अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सानिध्य* में आगामी 28 सितम्बर 2018 से तीन दिवसीय अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद का 52 वां राष्ट्रीय अधिवेशन चेन्नई (माधवरम) में आयोजित होगा।
अभातेयुप के राष्ट्रीय अध्यक्ष विमल कटारिया और महामंत्री संदीप कोठारी के नेतृत्व में आयोजित उक्त अधिवेशन में देशभर की लगभग 342 शाखा परिषदों से हजारों की संख्या में युवा हिस्सा लेंगे।

गौरतलब है कि प्रतिवर्ष आयोजित उक्त राष्ट्रीय अधिवेशन में वार्षिक गतिविधियों की समीक्षा,कार्य प्रतिवेदन,कार्यसमीक्षा,और भावी योजनाओ के बारे में विस्तृत जानकारी युवाओ को प्रदान की जाती है और निर्णीत कार्यो को क्रियान्वित करने हेतु विभिन्न योजनाए बनाई जाती है।

अभातेयुप द्वारा में हु सामायिक साधक और तपोयज्ञ के माध्यम से वर्ष भर प्रतिदिन युवाओ में तपस्या जैसे धार्मिक उपक्रम आयोजित कर युवाओ में सयंम ,और आध्यात्मिक चेतना जगाने का पवित्र कार्य किया जा रहा है।वही दूसरी और अभातेयुप सामाजिक दायित्व बोध के रूप में मानवसेवा के क्षेत्र में आचार्य श्री तुलसी डायग्नोस्टिक सेंटर,विशाल रक्तदान शिविर,आपदा में बचाव एवं राहत हेतु NDRF द्वारा प्रशिक्षित तेरापंथ टास्क फोर्स,समाज की प्रतिभाओं के विकास के लिए पूरे देश मे सरगम जैसे कई आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर करती आ रही है।
अभातेयुप पिछले 54 वर्षों से समाज के आध्यात्मिक ऒर सामाजिक विकास की दिशा में गतिशील है।
विदित है कि सवा करोड़ नमस्कार महामन्त्र का एक साथ एक समय पूरे देश मे सामूहिक जप और मेगाब्लड डोनेशन ड्राइव के माध्यम से पूरे देश मे एक दिन में एक लाख रक्त यूनिट जैसे सराहनीय कार्य कर अभातेयुप गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुकी है।
उक्त जानकारी देते हुए अभातेयुप क्षेत्रीय सहयोगी संजय पालरेचा,प्रेम बैद, अभातेयुप माइनॉरिटी सेल राष्ट्रीय सहप्रभारी व समिति सदस्य पुनीत भंडारी,सामायिक साधक और तपोयज्ञ के प्रदेश प्रभारी और अभातेयुप जेटीएन प्रतिनिधि पंकज जे.पटवा ने प्रदेश की समस्त तेयुप युवाशक्ति से चेन्नई के उक्त राष्ट्रीय अधिवेशन में ज्यादा से ज्यादा संख्या में सम्मलित होने का निवेदन किया।

Thursday, 19 October 2017

शुद्ध प्रत्याख्यान का आध्यात्म साधना में विशेष महत्त्व : आचार्यश्री महाश्रमण

-आचार्यश्री ने प्रत्याख्यान को निर्मल और शुद्ध बनाए रखने के पांच आयामों को किया व्याख्यायित 
-आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में टीपीएफ द्वारा आयोजित हुआ काॅरपोरेट प्रोफेशनल्स अधिवेशन 
-आचार्यश्री ने दिया आशीष कहा, धार्मिक संस्थाओं सहित सभी अर्थार्जन में प्रमाणिकता का करें प्रयास 
-चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति ने 126 सहयोगियों को आचार्यश्री के समक्ष किया सम्मानित 
-पदाधिकारियों ने दी भावाभिव्यक्ति, आचार्यश्री से आशीषवृष्टि कर प्रदान की नवीन ऊर्जा 
राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : कोलकाता के राजरहाट स्थित महाश्रमण विहार में वर्ष 2017 का चतुर्मास काल परिसम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को अध्यात्म समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को नित्य की भांति पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए अध्यात्म की साधना में प्रत्याख्यान का महत्त्व बताया तो उसके साथ ही प्रत्याख्यान को शुद्ध रखने के पांच आयामों को आगम के आधार पर शुद्ध रखने का विस्तार से वर्णन किया। आज आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में दो कार्यक्रम भी आयोजित हुए। तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम द्वारा कारपोरेट प्रोफेशनल्स के दूसरे अधिवेशन का आयोजन हुआ तो वहीं दूसरी ओर कोलकाता चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति और आचार्य महाप्रज्ञ महाश्रमण एजुकेशन एंड रिसर्च फाउण्डेशन द्वारा आयोजित हुआ। जिसमें इस चतुर्मास को सफल बनाने में सहयोग करने वाले कुल लगभग 126 सहयोगियों को सम्मानित किया गया। 
          रविवार की सुबह नित्य की भांति सर्वप्रथम आचार्यश्री ने अपने मंगल महामंत्रोच्चार के उपरान्त आगामाधारित अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आध्यात्मिक साधना में एक शब्द प्रत्याख्यान आता है। प्रत्याख्यान का अध्यात्म साधना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। गृहस्थ भी प्रत्याख्यान अर्थात् कुछ परित्याग करते हैं। गृहस्थ कभी किसी वस्तु के प्रयोग का परित्याग करता है तो कभी उपवास आदि के प्रत्याख्यान करता है। प्रत्याख्यान के पांच आयाम बताए गए हैं। उनमें पहला आयाम है-श्रद्धानुशुद्ध। जो भी प्रत्याख्यान लिया जा रहा हो उसके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। दूसरा आयाम विनयसमाचारण। प्रत्याख्यान का स्वीकरण करते वक्त विनय का भाव हो। तीसरा आयाम अनुभाषणा शुद्ध होता है। प्रत्याख्यान के दौरान गुरुमुख से सुनने के बाद पाठ को शुद्ध रूप से दोहराने का प्रयास करना चाहिए। चैथा आयाम है कि प्रत्याख्यान की अनुपालना शुद्ध हो। पांच आयाम है कि प्रत्याख्यान में राग-द्वेष नहीं, पूर्ण भाव शुद्धि के साथ ग्रहण किया जाए। कठिनाइयों में प्रत्याख्यान की शुद्धता को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। सभी अपने संकल्पों को शुद्ध रखने का प्रयास करें तो आध्यात्मिक उत्थान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। आचार्यश्री ने अर्थार्जन में सभी को नैतिकता और प्रमाणिकता को बनाए रखने की प्रेरणा प्रदान करने के साथ ही धार्मिक संस्थाओं को भी अपने कार्यों में प्रमाणिकता को बनाए रखने का प्रयास करने की पावन प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री टीपीएफ द्वारा आयोजित कार्यक्रम को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। 
           तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रकाश मालू, इस अधिवेशन के संयोजक श्री विनोद कोठारी ने अपनी विचारभिव्यक्ति दी। इस अधिवेशन के मुख्य अतिथि समाजसेवी व श्री गु्रप के वाइस चेयरमेन श्री सुनील कानोड़िया ने आचार्यश्री के प्रति अपनी श्रद्धासिक्त भावाभिव्यक्ति दी। 
           इसके उपरान्त कोलकाता चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री कमलकुमार दूगड़, आचार्य महाप्रज्ञ महाश्रमण एजुकेशन एंड रिसर्च फाउण्डेशन के अध्यक्ष सुरेन्द्र दूगड़, इस ट्रस्ट के प्रधान न्यासी श्री भिखमचंद पुगलिया व चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री विनोद बैद ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। इसके उपरान्त इस चातुर्मासिक व्यवस्था में सहयोग करने वाले कुल 126 सहयोगियों को स्मृति चिन्ह चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति और आचार्य महाप्रज्ञ महाश्रमण एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के पदाधिकारियों द्वारा प्रदान कर सम्मानित किया गया। आचार्यश्री ने सभी को अपने मंगल आशीष की वृष्टि से अभिसिंचन प्रदान कर उनके हृदय में नवीन ऊर्जा का संचार कर दिया।

Saturday, 14 October 2017

आश्रवों को रोकने प्रयास है अध्यात्म की साधना: आचार्यश्री महाश्रमण

आश्रवों को रोक आत्मा को निर्मल बना कर आत्मा का कल्याण करने का आचार्यश्री ने बताया मार्ग
-तृतीय न्यायाधीश व अधिवक्ता अधिवेशन आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में टीपीएफ द्वारा आयोजित 
-आचार्यश्री ने अधिवक्ताओं व न्यायाधीशों को दिया आशीष, कार्यों में सत्यता-निष्ठा को बनाए रखने की दी प्रेरणा
-अधिवेशन के मुख्य अतिथि उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पहुंचे पूज्य सन्निधि में
-आचार्यश्री के समक्ष दी भावाभिव्यक्ति, आचार्यश्री से प्राप्त किया मंगल आशीर्वाद 


राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : जन-जन का कल्याण करने को निकले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में शनिवार को कोलकाता के राजरहाट स्थित महाश्रमण विहार में चतुर्मास काल परिसम्पन्न कर रहे महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम द्वारा आयोजित तृतीय न्यायाधीश व अधिवक्ता अधिवेशन में भाग लेने के लिए अधिवक्ताओं और न्यायधीश उपस्थित हुए। इस अधिवेशन के मुख्य अतिथि के रूप में भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश व मानवाधिकार आयोग के सदस्य श्री पीसी घोष भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे। 
         
आचार्यश्री ने उपस्थित न्यायाधीश और अधिवक्ताओं को प्रथम अपने मंगलवाणी का अभिसिंचन प्रदान करते हुए ‘ठाणं’ आगम में वर्णित आश्रवों के पांच द्वारों का वर्णन करते हुए कहा कि आश्रव वह हेतु है, जिसके कारण कर्म पुद्गल आत्मा से चिपकते हैं। वैसे आत्मा तो अपने आपमें शुद्ध तत्त्व है, किन्तु पाप और पुण्य के पुद्गल आत्मा से आश्रव के कारण चिपकते जाते हैं और आत्मा मलीन बन सकती है। आत्मा के पास तक कर्मों में लाने में सहायक आश्रव द्वार होते हैं। ‘ठाणं’ आगम में पांच प्रकार के आश्रव द्वार बताए गए हैं-पहला मिथ्यात्व, दूसरा अविरति, तीसरा प्रमाद, चौथा कषाय और पांचवा योग। आश्रवों को आत्मा तक पहुंचने से रोकने लिए आदमी को प्रयास करना चाहिए। आध्यात्म की साधना का मूल उद्देश्य आश्रव द्वारों को बंद करने या उन्हें रोकने का प्रयास किया जाता है। साधना के द्वारा ज्यों-ज्यों आश्रव कम होता है आत्मा का उर्ध्वारोहण होने लगता है। आदमी को आश्रवों को जानकर उन्हें रोकने का प्रयास करना चाहिए तथा अपनी आत्मा का कल्याण करने का प्रयास करना चाहिए। 
         
आचार्यश्री ने उपस्थित न्यायाधीशों और वकीलों को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि सामान्य तौर पर राग-द्वेष या काम-क्रोध के कारण आदमी अपराध कर सकता है या करता है। गलतियों को हृदय परिवर्तन के द्वारा रोकने का प्रयास धर्मगुरु करते हैं, किन्तु पूर्णतया समाप्त होना संभव नहीं हो सकता। गलतियों को रोकने के लिए गलतियों पर दंडित करने के लिए न्यायपालिका होती है। न्यायाधीश और वकील पूर्ण सत्यता और निष्ठा के आधार पर दोषियों को दोष के आधार पर दंडित करने का प्रयास करें ताकि सज्जन की सज्जनता में विश्वास बना रहे और गलतियों पर रोक लगाई जा सके। न्यायाधीश का यह पहला धर्म होना चाहिए कि किसी के साथ अन्याय न होने पाए। न्याय और दंड के आधार पर वकील और न्यायाधीश समाज और देश को निरपराधता की ओर ले जाने में अपना सहयोग प्रदान कर सकते हैं। 
          वहीं आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अधिवेशन के मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश व मानव अधिकार आयोग के सदस्य श्री पीसी घोष ने आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरान्त अपनी विचाराभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री से मंगल आशीष की आकांक्षा की। तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रकाश मालू ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। इसके अलावा श्री एसके सिंघी व श्री राज सिंघवी ने लीगल सेल की जानकारी दी। मुख्य अतिथि का स्वागत टीपीएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मालू व महामं़त्री श्री नवीन पारख द्वारा साहित्य प्रदान कर किया गया। 

Friday, 13 October 2017

आदमी को विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए - आचार्यश्री महाश्रमण

महातपस्वी की मंगल सन्निधि में भव्य दीक्षांत समारोह का समायोजन
- जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के 4427 विद्यार्थियों को प्रदान की गई उपाधि
- विश्वविद्यालय के आध्यात्मिक अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने विद्यार्थियों को प्रदान किया मंगल आशीष
- आचार्यश्री ने केवल ज्ञानी के पास बताए पांच अनुत्तर उपलब्धियां
- आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे पश्चिम बंगाल सरकार के उच्च शिक्षामंत्री श्री पार्थ चटर्जी
- मुख्य अतिथि के रूप में दी भावाभिव्यक्ति, आचार्यश्री से प्राप्त किया आशीष
- राजस्थान के देवस्थान विभाग के मंत्री श्री राजकुमार रिणवा व लाडनूं विधायक ठाकुर मनोहर सिंह 

राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी, व जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में शुक्रवार को जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के 10वें दीक्षांत समारोह का भव्य आयोजन हुआ। इसमें मुख्य अतिथि के रूप में पश्चिम बंगाल के उच्च शिक्षामंत्री श्री पार्थ चटर्जी, विशिष्ट अतिथि राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के मंत्री श्री राजकुमार रिणवा व लाडनूं, राजस्थान के विधायक ठाकुर मनोहर सिंह भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित थे। 
          कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रगान के उपरान्त आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के कुलपति श्री बच्छराज दूगड़ ने विश्वविद्यालय के शुभारम्भ, वर्तमान के क्रिया-कलापों, उपलब्धियों और भविष्य के योजनाओं के विषय में संपूर्ण जानकारी दी। विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती सावित्री जिंदल ने दीक्षांत समारोह कार्यक्रम की अनुमति प्रदान की तो कुलपति ने कार्यक्रम के शुभारम्भ की घोषणा की। इस दीक्षांत समारोह में नियमित स्नातक के 213, स्नातकोत्तर के 64, पीएचडी के 35, डिलिट् के 2, दूरस्थ शिक्षा स्नातक के 1971 व स्नातकोत्तर के 2110 विद्यार्थियों सहित कुल 4427 विद्यार्थियों को उपाधि प्रदान की। इस दौरान कुल 32 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक भी प्रदान किए गए। समस्त उपाधि व पदक कुलाधिपति श्रीमती सावित्री जिंदल, कुलपति डा. बच्छराज दूगड़, जैन विश्व भारती संस्थान के अध्यक्ष श्री रमेशचंद बोहरा, राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के मंत्री श्री राजकुमार रिणवा व लाडनूं विधायक ठाकुर मनोहर सिंह द्वारा प्रदान किए गए। 
          इसके उपरान्त विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती सावित्री जिंदल ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि पूर्वाचार्यों के प्राप्त आशीर्वाद और वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमणजी के अभिसिंचन से यह विश्वविद्यालय मानवता, अहिंसा नैतिकता के साथ अनुशासनात्मक जीवन जीने की प्रेरणा विद्यार्थियों को प्रदान कर रहा है। हमें गर्व है कि जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय संपूर्ण जैन समाज को एक विचारधारा की माला से गूंथ रहा है। लाडनूं विधायक ठाकुर मनोहर सिंह ने कहा मेरे लिए यह गौरव की बात है कि आज जैन विश्व भारती के कारण लाडनूं को पूरा विश्व जानने लगा है। जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को आज उपाधि मिली है। यह विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा कार्य कर रहा है। 
          राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के मंत्री श्री राजकुमार रिणवा ने अपनी मूल भाषा (राजस्थानी) में भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि मैं आज आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि प्राप्त कर अपने आपको अभिभूत महसूस कर रहा हूं। आचार्यश्री! मैं ऐसा मानता हूं कि आदमी केवल आचार्यश्री महाश्रमणजी की शरण में आ जाए तो उसे वास्तविक सुख की प्राप्ति हो जाएगी। आपके इस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों अथवा आपके अनुयायियों की सेवा भावना देखता हूं तो मन गदगद हो जाता है। आपने जो सभी ग्रंथों का सार परमार्थ की जो शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, वह हम सभी का कल्याण करने वाली है। जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय केवल किताबी शिक्षा ही जीवन को अच्छा बनाने और खुद को बेहतर बनाने की भी शिक्षा प्रदान कर रही है। 
         
इसके उपरान्त विश्वविद्यालय के आध्यात्मिक अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने विद्यार्थियों को श्रुत प्राप्ति, एकाग्रचित्त होने, आत्मा को धर्म में स्थापित करने, असंयम को छोड़ संयमित होने, स्वाध्याय में रत रहने, प्रमाद से बचने, आवेश को नियंत्रित करने, सहिष्णुता का विकास करने का संकल्प प्रदान कर उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा आशीर्वाद से अभिसिंचन प्रदान किया। 
          उपस्थित समस्त विद्यार्थियों, गणमान्यों व श्रद्धालुओं को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि हमारी दुनिया में कुछ व्यक्ति भी होते हैं जो साधना की पराकाष्ठा तक पहुंच जाते हैं। साधु तो साधना के माध्यम से केवल ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। केवल ज्ञानी सर्वज्ञ होते हैं। उनके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं होता। केवल ज्ञानी की पांच अनुत्तर उपलब्धियां-अनुत्तर ज्ञान, अनुत्तर दर्शन, अनुत्तर चारित्र, अनुत्तर तप और अनुत्तर विर्य प्राप्त करने वाले होते हैं। आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान की आराधना एक प्रकार की तपस्या है। ज्ञानाराधना करने वाले विद्यार्थी को पूरी निष्ठा के साथ ज्ञान ग्रहण का प्रयास प्रयास करना चाहिए। ज्ञान के साथ चारित्र, अहिंसा, नैतिकता के प्रति निष्ठा रखने का प्रयास करना चाहिए और नशामुक्त जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा को सभी ग्रंथों का सार बताते हुए कहा कि सभी के साथ मैत्री का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आशीष वृष्टि करते हुए कहा कि विद्यार्थियों में अहिंसा की चेतना, नैतिकता के भाव सदाचार, ज्ञान और आचार अच्छा विकास हो। भ्रष्टाचार को स्थान न मिले, सदाचार बना रहे। विद्यार्थी देश के भविष्य होते हैं। जिस विद्या संस्थान द्वारा कोरा ज्ञान की ही नहीं अच्छे आचार और संस्कार के निर्माण का प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री ने सभी में अच्छी निष्ठा, ज्ञान का विकास और विशिष्ट कार्य करने का प्रयास करते रहने की पावन प्रेरणा भी प्रदान की। इसके उपरान्त अहिंसा यात्रा के प्रवक्ता मुनि कुमारश्रमणजी और जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के प्रो. आनंदप्रकाश प्रकाश त्रिपाठी, कोलकाता चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री कमलकुमार दूगड़ ने भी विचाराभिव्यक्ति दी। 
          इस दौरान दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि पश्चिम बंगाल सरकार के उच्च शिक्षामंत्री श्री पार्थ चटर्जी ने भी आचार्यश्री के दर्शन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरान्त अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि वास्तव में यह विश्वविद्यालय विद्यार्थियों मंे अच्छे संस्कारों से युक्त शिक्षा प्रदान कर रहा है। मैं आज आपके दर्शन कर धन्य महसूस कर रहा हूं। मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि आप बार-बार यहां पधारकर हमें अपनी प्रेरणा से लाभान्वित करते रहें। 
          उपस्थित मुख्य अतिथि सहित विशिष्ट अतिथियों को कुलाधिपति, कुलपति सहित अन्य गणमान्यों द्वारा स्मृति चिन्ह व साहित्य प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस दौरान जैन विश्व भारती संस्थान के अध्यक्ष श्री रमेशचंद बोहरा द्वारा जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय को एक करोड़ का चेक भी प्रदान किया।