संयम के साधक ने संयम की सुरक्षा के प्रति जागरूक रहने को किया उत्प्रेरित- चतुर्दशी के दिन आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित हुए गुरुकुलवासी चारित्रात्माएं - महाव्रतों की पालना सहित कथनी-करनी में समानता की भी दी प्रेरणा - ठाणं आगमाधारित प्रवचन में आचार्यश्री ने कैवलिकी साधना को किया व्याख्यायित
25.08.2018 माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु): जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी, संयम के साधक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज अपने समीपस्थ उपस्थित समस्त चारित्रात्माओं को अपने संयम के पालन के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक रहने और उनकी अनुपालना करने की पावन प्रेरणा प्रदान की। संयम की साधना को सबके लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि संयम की साधना जितनी पूर्ण जागरूकता के साथ होगी, वह आदमी के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है।
शनिवार को प्रातः नित्य की भांति आचार्यश्री माधावरम के चतुर्मास प्रवास स्थल परिसर में बने भव्य और विशाल ‘महाश्रमण समवसरण’ में मंचस्थ हुए तो शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के दोनों ओर गुरुकुलवास में उपस्थित लगभग समस्त साधु-साध्वियां भी उपस्थित था। अवसर था श्रावण मास के शुक्ला चतुर्दशी का। प्रत्येक महीने में दो बार आने वाली चतुर्दशी तिथि को साधु-साध्विवृंद आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित होते हैं। क्योंकि चतुर्दशी के दिन हाजरी वाचन का क्रम होता है। इस दिन एक ओर आचार्यश्री चारित्रात्माओं को उनके द्वारा स्वीकार किए गए संकल्पों को स्मृति कराने के साथ ही उन्हें दृढ़ता और पूर्ण निष्ठा के साथ पालन की भी प्रेरणा प्रदान करते हैं तो वहीं चारित्रात्माएं भी अपने आराध्य के समक्ष अपने समस्त संकल्पों की पुनरावृत्ति करते हैं और अपनी देव, गुरु और धर्म के प्रति संपूर्ण निष्ठा के भावों को भी दोहराते हैं। शनिवार को भी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी का अवसर था मंच के मध्य विराजमान तेरापंथ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य के दोनों तरफ उपस्थित साधु-साध्वी समाज ऐसे महासूर्य के श्वेत रश्मियों के भांति प्रतीत हो रहे थे।
आचार्यश्री ने ‘ठाणं’ आगमाधारित पावन प्रवचन में कैवलिकी साधना को विवेचित करने के उपरान्त आचार्यश्री कहा कि साधु की आराधना अच्छी होनी चाहिए। साधु को प्राप्त संयम रत्न और चारित्र रत्न के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। संयम के प्रति जागरूक रहने से उनका जीवन भी अच्छा हो सकता है और साधना के पथ पर आगे की दिशा में और आगे गति कर सकते हैं। संयम की साधना के प्रति प्रमत्त रहने वाले, जागरूकता बरतने वालों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। स्वीकार्य महाव्रतों के साथ-साथ समितियों और गुप्तियों के प्रति भी जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। व्यवहार में लचिलापन हो, किन्तु किसी बात पर ढृढ़ता के साथ कायम भी रहने का प्रयास करना चाहिए। संयम की समुचित अनुपालना हो तो साधना भी अच्छी हो सकती है। सभी को कथनी-करनी में समानता रखने का प्रयास करना चाहिए। कथनी-करनी में समानता की बात हो तो साधना में भी उच्चता की बात हो सकती है।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त भारत के पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति बी.डी. जत्ती के पुत्र व वासव समिति के अध्यक्ष श्री अरविन्द जत्ती ने अपनी ‘वचन’ की 23वीं भाषा में अनुवादित पुस्तक को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया। तदुपरान्त श्री रायचन्द खटेड़ व श्री अरविन्द जत्ती ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने पुस्तक के संदर्भ में मंगल आशीष भी प्रदान की। चेन्नई के इनकम टेक्स विभाग के असिस्टेंट कमिश्नर श्री नंदाकुमार ने आचार्यश्री के दर्शन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।
संप्रसारक- सूचना एवं प्रसारण विभाग
जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा

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