सूरत की एक घटना जो प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और शोशल मीडिया द्वारा पूरे देश मे जैन अजैन समाज मे वायरल हुई । जैन संत आचार्य शांति सागर जी को कल हिरासत में लिया गया और ऐसा सुनने में आया कुछ शिष्यों ने विरोध भी दर्ज किया । जैन धर्म में त्याग तपस्या व साधना ओर जैन साधुओं की कठिन चर्या होती है । दिगम्बर सम्प्रदाय में साधु संत निर्वस्त्र रहते है ओर श्वेताम्बर सम्प्रदाय में साधु संत श्वेत वस्त्र धारण करते है । अपरिग्रही व सांसारिक मोह माया से दूर रहते है । छोटे से जैन समाज मे कंही घटक है जिसमे दो प्रमुख दिगम्बर व श्वेताम्बर सम्प्रदाय है जिनमे भी अनेक पंथ व अनेक आचार्य व साधु , साध्वी भिन्न भिन्न पूजा पद्धति का अनुसरण करते है । तो कुछ पंथ मूर्तिपूजा को नही मानते मगर सभी भगवान महावीर के द्वारा प्रद्दत सिदान्तों का अनुसरण करते है यह जरूर है समय के साथ साधु संतों ने भगवान महावीर के सिदाँतो को अलग अलग रूप दे दिया है! मगर अहिंसा , करुणा , दया , अपरिग्रह आज भी मुख्य सिदान्त है । मगर समय के साथ साधु संतों की चर्या में भी परिवर्तन हुआ है आज साधु संत मोबाइल का उपयोग भी करने लगे है वैसे में इसका उपयोग को गलत नही मानता समय के अनुसार परिवर्तन हुआ है और होना भी चाहिए मगर उपयोग कैसे हो कितना हो यह न कोई नियम है ओर न ही इस पर कोई मंथन किया गया । अगर धर्म प्रभावना या जरूरी संदेशों के आदान प्रदान के लिए उपयोग होता है तो कुछ हद तक सही भी है । मगर इन संसाधनों के कारण अगर गलत कार्य होता है तो साधु समाज हो या श्रावक समाज दोनो के लिए चिंतनीय है । आगमो व जैन सिदाँतो के अनुसार रात्रि काल मे संतो के प्रवास स्थल पर अकेली महिलाओं का रहना या जाना वर्जित है रात्रिकाल में साधु संत महिलाओ से नही मिलते मगर आजकल न श्रावक समाज इस ओर ध्यान दे रहा है न कुछ साधु संत जो इसका पालन नही करते और सूरत जैसी घटना का जन्म होता है वैसे स्पष्ट कर दु जब तक शांति सागर जी पर लगे आरोप साबित नही हो जाते कुछ कहना ठीक नही होगा । हो सकता है आरोप सही हो और हो सकता है इन आरोप के पीछे कोई साजिश हो । इस मामले में अदालत निर्णय देगी उसके पहले कुछ कहना भी ठीक नही होगा । मगर आज इस तरह के मामले सामने आने के बाद जैन समाज के सामने एक चिंतन का विषय जरूर उभर कर आया है जिस पर समाज को चिंतन करना भी जरूरी है । समाज मे श्रावक की क्या भूमिका है साधु संतों के प्रति क्या दायित्व है और साधु संतों की मर्यादा क्या है यह सभी अग्रणी साधु संतों से विचार व परामर्श करके सुनिश्चित किया जाना चाहिए । क्यों कि वर्तमान परिस्थितियो को देखते हुए कुछ साधु संत जिस तरह से चर्या के अनुरूप नही चल रहे है उसे हमे प्रचारित न करके स्वयं साधु संतों को अनुरोध करना चाहिए कि अपनी अपनी परंपरा का अनुसरण करते हुए पालन करे । साथ मे अंधश्रद्धा व अंधभक्त होकर इसका अनुसरण न करे यह भी बहुत जरूरी है में यह नही कहता कि आप अपने गुरु , साधु संतों का विरोध करो मगर हम अनुनय विनम्रता से अनुरोध तो कर ही सकते है कि समाज के सभी श्रावको की आप मे पूर्ण आस्था है और अगर कंही आस्था को ठेस पहुंचती है तो यह भी गलत है । साधु संतों के आप सपरिवार दर्शन करें । पूजा अर्चना भी करे अपनी श्रद्धा भक्ति भी रखे प्रवचन का श्रवण भी करे ध्यान आराधना सामयिक आदि भी करे मगर सभी श्रावको को ध्यान भी रखना चाहिए कि अगर साधु संत जिस तरह का आरोप शांति सागर जी पर लगाया गया कि मन्त्र जाप के लिए अगर रात्रि को रुकना या महिला को अकेले में सेवा करना या तंत्र मंत्र के नाम पर भ्रमित कोई साधु संत करे तो वहाँ के निजी संस्था को अवगत कराएं । ओर संस्था का दायित्व होता है कि साधु संतों को इस तरह के कार्य के लिए रोके । जैन धर्म मे जंहा तक मेरा अनुभव है साधु संत किसी तरह का चमत्कार नही बताते सूरत में शांतिसागर जी के चमत्कार का वीडियो मुझ तक भी व्हाट्स एप के माध्यम से पहुँचा था मेरी समझ से परे है साधु संतों को इस तरह के चमत्कार बताने की क्या जरूरत आ गयी । जिससे हमारा जैन समाज भ्रमित हो इस तरफ हमे हमारे जैन समाज व साधु संतों को विशेष ध्यान देना चाहिए । जैन संत तप , आराधना , सामयिक , धर्मोउपदेश प्रदान करे भगवान महावीर के सिदाँतो व उनके संदेश को समझाये । मेरे इस आलेख का उद्देश्य साधु संतों व जैन समाज के श्रावको की आलोचना करना नही है मगर जैन समाज की हो रही बदनामी ओर पथ से विचलित हो रहे साधु संत व श्रावको तक एक संदेश पहुचाना ही मुख्य उद्देश्य है । हम सभी जैन समाज को एक होकर मंथन करना चाहिए कि चाहे श्रावक हो या साधु संत हमारे नियमो व आगमो के अनुरूप हम अनुसरण करें । मेरे इस आलेख द्वारा किसी का मन आहत हुआ हो तो क्षमा याचना ।
लेखक - उत्तम जैन ( विद्रोही )

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